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मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

जन्मपत्रिका में शनि विचार

ज्योतिषीय नवग्रहों में सबसे ज्यादा भयभीत करने वाले ग्रह के रूप में अपनी पहचान बनाये हुये ग्रह हैं शनि । जो कि वैदिक कथाओं में देव पद पर आसीन हैं फिर भी राहु केतु का दैत्य होते हुये भी उतना भय नहीं है जितना शनि देव का है । भय भी ऐसा कि शनिवार के दिन कोई कमण्डल में शनि का दान लेने द्वार पर आ जाये तो उसे नकारने का साहस नहीं जुटा पाते और शनिवार के दिन जूते चप्पल चोरी हो जाने पर भी मुस्कुराते हुये एक तसल्ली के साथ नंगे पैर घर आ जाते हैं कि चलो शनि का दान उतर गया । पर क्या वाकई शनिदेव इतने बुरे हैं कि हर किसी को सिर्फ परेशान ही करते रहें ? नहीं ! वास्तव में ऐसा नहीं है, लेकिन विगत कुछ दशकों में जैसे जैसे पारिवारिक, सामाजिक, और व्यावसायिक परेशानियों के कारण मानसिक संताप ‌और तनाव बढता गया है वैसे वैसे ही अंधविश्वास और धर्म के नाम पर कालाबाजारी भी बढी है । ऐसे में कुछ कर्मकाण्डी पंडितों  ने जिन्हें ज्योतिष का ज्ञान नहीं है या अधूरा ज्ञान है, कुछ ज्योतिषीय योग एवं स्थितियों के माध्यम से अपने यजमानों को डराकर खूब चाँदी काटी है । उनके अनुसार आपके जीवन में किसी भी तरह का कोई भी दुख संकट हो तो उसका कारण या तो कालसर्प योग होगा, अगर न हुआ तो शनि की ढैया या साढे़साती मिल ही जायेगी क्योंकि एक समय में २ राशियों पर ढैया और ३ राशियों पर साढे़साती चल ही रही होती है । मतलब कि कुल १२ राशियों में से ५ पर तो शनि का प्रभाव होगा ही और अगर ये भी न हो तो शनि की युति, दृष्टि, स्थिति, दशा कुछ तो मिलना ही है बस इतने में काम हो गया ।

          सबसे अव्वल तो ये कि कोई भी ग्रह बुरा या अच्छा नहीं होता । बस सभी का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है और उसी के अनुसार उसके कारकत्व होते हैं, और किसी पत्रिका में कोई ग्रह किन भावों का प्रतिनिधित्व कर रहा है उसी के अनुसार फल दे सकता है । जब हम शनि की बात करते हैं तो शनिदेव को हमें अपने कर्मों का फल देने का अधिकार दिया गया है ध्यान दीजिये अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही होगा और बुरे कर्मों का फल बुरा होगा । और दूसरी महत्वपूर्ण बात कि कोई भी ग्रह फल तभी दे सकते हैं जब दशा और गोचर में वे प्रभावी हों और किसी भाव से संबंधित फल देने के लिये दशा और गोचर अनुकूल स्थिति में हों  । यहाँ भी साढ़ेसाती और ढैया का प्रभाव स्पष्ट हो जाता है क्योंकि ये योग या कहें कि यह स्थिति सिर्फ गोचर के अनुसार होती है जबकि किसी भी प्रकार का फल कथन करने के लिये दशा का अध्ययन करना भी अत्यंत आवश्यक है । 
          शनि, सूर्यपुत्र हैं लेकिन दोनों पिता पुत्र में मतभेद है, दोनों के कारकत्व भी विरोधी हैं या कहें कि बिल्कुल विपरीत हैं । एक समानता ये है कि दोनों को ही क्रूर कहा गया है, लेकिन दोनों को जो कार्य विधान द्वारा सौंपा गया है उसके लिये क्रूर होना भी आवश्यक है । सूर्य राजा हैं और उन्हें निष्पक्ष निर्णय देने के लिये क्रूर होना आवश्यक है और शनि कर्म फल दाता हैं इसलिये शनि को भी क्रूर होना पड़ता है यदि वे क्रूर न होकर भावुक हो जायें तब वे निष्पक्ष रूप से कर्म फल नहीं दे पायेंगे । सूर्य जहाँ राजा का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं शनि प्रजा का प्रतिनिधित्व करते हैं, अगर सूर्य प्रथम श्रेणी के अधिकारी हैं तो शनि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी । सूर्य शासक को इंगित करते हैं तो शनि कर्मठ कार्यकर्ता, आज्ञाकारी सेवक को इंगित करते हैं । सूर्य सबसे मंहगी और दुर्लभ धातु स्वर्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं तो शनि को सर्व सुलभ लोहा प्रिय है । शनि समुद्री नमक का प्रतिनिधित्व करते हैं तो नमक के अधिक सेवन को सूर्य के पीड़ित होने का कारक बताया गया है । सूर्य भौतिक उन्नति नाम, पद, प्रतिष्ठा के सूचक हैं तो शनि आध्यात्मिक उन्नति के । इस तरह हम समझ सकते हैं कि पिता पुत्र में मतभेद क्यों है ।
          शनि अध्यात्म के भी प्रबल कारक हैं, ‌और इसी वजह से कुछ और इल्जाम भी शनि पर लगाये जाते हैं, जैसे कि शनि का स्वभाव एकाकी है, वे स्वार्थी हैं आदि । जबकि आध्यात्मिक विकास के लिये एकांत प्राथमिक आवश्यक तत्व हो जाता है, दूसरा आवश्यक तत्व है स्व के विकास की प्रवृत्ति । जिसके कारण शनि को स्वार्थी भी कहा गया है,  जब तक जातक स्वार्थी नहीं होगा तब तक वह अन्य में उलझा रहेगा और ऐसी स्थिति आध्यात्मिक विकास में बाधा साबित होगी और अन्यों से दूर करने के गुण के कारण शनि को विच्छेदकारी ग्रह भी कहा गया है । इसके बाद जरूरी है गहन चिंतन । शनि गहन चिंतन की प्रवृत्ति देते हैं और अनुसंधान जैसे कार्यों के लिये गहन चिंतन बेहद जरूरी होता है इसलिये शनि का प्रभाव जातक को अनुसंधान के क्षेत्र में भी ले जाता है, या शनि का प्रभाव होने पर जातक गहन चिंतन वाला, अनुसंधान और विश्लेषण कर्ता होता है । वह किसी बात को बहुत जल्दी भूलता नहीं है वरन मन में बार बार उसकी आवृत्ति करता रहता है और नये नये निष्कर्ष निकालता रहता है । विषय का आवश्यकता से अधिक चिंतन कभी कभी निराशावादी भी बना देता है, और नकारात्मक विचारों को जन्म देता है । कोई शुभ प्रभाव न होने एवं अन्य अशुभ प्रभावों के होने पर ऐसे जातक आत्महत्या को भी प्रेरित हो जाते हैं ।
           शनि को वृद्ध भी कहा गया है, वास्तव में वृद्ध होने का मतलब सिर्फ शरीर से वृद्ध होना नहीं होता बल्कि अपनी उम्र से अधिक उम्र वाली सोच रखने वाले को भी वृद्ध कहा जाता है । इसलिये शनि परिपक्वता के भी सूचक हैं । जब शनि के प्रभाव से जातक की सोचने की प्रवृत्ति गहन स्तर तक होगी तब ऐसा जातक जल्दी ही परिपक्व मानसिकता को पा लेता है और अपने हमउम्रों के बीच वृद्ध होने की उपाधि को पाता है । खासकर जब शनि पंचम भाव में स्थित हो तो जातक की सोच अपनी उम्र से काफी आगे चलती है । ऐसे जातक मध्यस्थता करने और परामर्श कार्य करने में भी सक्षम होते हैं ।
          शनि अनुशासन प्रिय हैं और सात्विक भी, जब भी शनि की दशा, अन्तर्दशा जारी हो या साढे़ साती या ढैया चल रही हो तब जातक को खान पान और व्यवहार में सात्विक रहने की हिदायत सबसे पहले दी जाती है । माँस मदिरा के सेवन से दूर रहना और वरिष्टों के साथ ही साथ अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से भी उचित व्यवहार करना शनि की नज़रों में अपनी छवि सुधारने जैसा ही है । शनि बहुत ही व्यावहारिक दृष्टि से जीवन को देखते हैं और भावनाओं में बहकर निर्णय लेना शनि का सूचक नहीं है । भावुकता से शनि का संबंध कालपुरूष की कुण्डली से भी समझा जा सकता है, शनि का २ राशियों पर स्वामित्व है पहली राशि मकर जो कि कालपुरुष की कुण्डली में दशम भाव में स्थित हुई है यह राशि भावुकता के भाव अर्थात पंचम से षष्ठम् भाव में स्थित हुई है और दूसरी राशि है कुंभ जो कि पंचम से सप्तम में स्थित हुई है यानि कि पंचम से ठीक विपरीत भाव में । इस तरह दोनों ही राशियाँ भावुकता के पक्ष में नहीं हैं । इसीलिये शनि का प्रभाव होने पर जातक भावुक न होकर तर्कसंगत होता है । ऐसे जातक सिर्फ उन्हीं परंपरा का पालन कर पाते हैं जिनका तार्किक कारण उन्हें पता हो और न पता होने की स्थिति में वे तर्कसंगत व्यावहारिक कारण कि खोज भी करते हैं । तर्कसंगत होने के कारण ही शनि प्रधान जातक गणित, विज्ञान जैसे विषय की ओर अधिक आकृष्ट होते हैं और इंजीनियरिंग, तथा विधिक या न्यायिक विभाग जैसे व्यावहारिक और तार्किक क्षेत्रों को अपना कर्मक्षेत्र चुनते हैं । शनि दशम एवं एकादश भाव के स्वामी होकर कर्म को प्रधानता देते हैं, लाभ के कारक भी होते हैं  और साथ ही मितव्ययिता कि प्रवृत्ति भी देते हैं ।
          मन्दचार यानि मन्द गति से चलने वाला । शनि को मन्दचार कहा जाता है क्योंकि भचक्र की परिक्रमा पूरी करने में शनि को अन्य आठ ग्रहों की तुलना में सबसे अधिक समय लगता है, हालांकि खगोलीय दृष्टि से ये तुलना एक बेमानी ही है क्योंकि शनि का पथ भी अन्य ग्रहों की तुलना में सबसे बड़ा है और इसीलिये शनि एक राशि में अन्य ग्रहों की तुलना में अधिक समय तक रहते हैं । जब शनि को किसी भी राशि में एक लंबे समय तक रहना ही है तो उससे संबंधित फल देने में जल्दबाज़ी क्यों हो अतः शनि जिस भाव से संबंध बनाता है उससे संबंधित फल देने में समय अधिक लेता है । ये स्पष्ट हो कि शनि सिर्फ समय अधिक लेता है न कि फल देता ही नहीं है । और किसी भाव के फल विलंब से मिलना कभी शुभ होता है और कभी परेशानी का सबब बनता है, जैसे यदि शनि विवाह भाव में स्थित हो जाये या विवाह भाव के स्वामी से या भाव से किसी तरह संबंध बनाये तो विवाह में विलंब होना ही है जो परेशानी का कारण हो सकता है लेकिन, जब शनि अष्टम मृत्यु भाव से संबंध बना ले तो मृत्यु विलंब से देता है जो लंबी आयु का कारण बनता है । शनि की गति मंद होने के कारण ही शनि सुस्ती, आलस्य और कभी कभी लापरवाही का कारण भी बनता है ।
          शनि चूँकि सुस्त और धीमा ग्रह है और मंगल सेनापति होने के नाते चुस्त और फुर्तीला ग्रह है, इसलिये शनि और मंगल की ऊर्जा एकदम विपरीत हैं और जब दो विपरीत ऊर्जायें आपस में टकराती हैं तो विनाश की संभावना बढ़ जाती है शायद इसीलिये शनि मंगल की युति होने पर बनने वाले योग को विष योग कहा गया है । शनि को नपुंसक ग्रह भी कहा गया है जबकि निर्बीज राशियों में शनि कि एक भी राशि शामिल नहीं है फिर ऐसा क्यों ? मेरे मतानुसार शनि प्रजा के सूचक है और प्रजा कोई भी हो सकती है वो पुरूष हो सकती है और महिला भी और सभी लिंगों का मिश्रण भी । शनि निष्पक्ष हैं वे लैंगिक आधार पर कर्मों के फल प्रदान नहीं करते हैं । जहाँ अन्य ग्रह किसी न किसी लिंग का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं शनि किसी एक लिंग के सूचक नहीं हैं और शायद इसीलिये शनि को नपुंसक की संज्ञा भी दी गई होगी ।
          शनि के संबंध में अभी और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बारह भावों में शनि के प्रभाव और फल तत्पश्चात् अन्य ग्रहों से, विभिन्न राशियों एवं भावों में युति एवं दृष्टि आदि के फल लेकिन इस तरह से जितना भी लिखा जायेगा वो अपर्याप्त ही होगा क्योंकि सभी के अनुभव सर्वथा भिन्न हो सकते हैं । फिर भी मैनें अपने अनुभव एवं विश्लेषण के आधार पर शनिदेव के संबंध में अपनी अल्पबुद्धि से जो जाना है वह सुधि पाठकगण के लिये लिपिबद्ध किया है । संभावित त्रुटियों के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ ।

-जयपुर से प्रकाशित पत्रिका -"ज्योतिष सिद्धांत" के अक्टूबर‍ - दिसम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित

बुधवार, 2 जनवरी 2013

गुरू और शनि



कहा जाता है कि गुरू जहाँ बैठता है वहाँ के अच्छे फल नहीं देता मगर जहाँ देखता है उन भावों के फलों की शुभता में वृद्धि करता है । ज्योतिष में गुरू की दृष्टि को अमृत के समान माना गया है । वहीं शनि के बारे में कहा जाता है कि शनि जहाँ भी बैठता है उस भाव को बढ़ाता है मगर जहाँ दृष्टि डालता है वहाँ अपने विनाशकारी प्रभाव देता है या कहें की उस भाव से संबंधित शुभ फलों में कमी करता है और अशुभता की वृद्धि करता है । ज्योतिष का ये नियम प्रायः देखने सुनने में आता रहता है मगर इसके पीछे मूल कारण क्या हो सकता है ये कोई नहीं बताता । मैनें पाया कि अगर हमें इस प्रश्न का सही जवाब चाहिये तो इसके मुख्य तत्वों गुरू और शनि के मूल स्वभाव की पड़ताल की जानी बेहद जरूरी है और महत्वपूर्ण भी । अगर हम गुरु और शनि की नैसर्गिक प्रकृति को ध्यान में रखें तो हमें इसका जवाब आसानी से मिल सकता है ।
          पहले गुरू की बात करें तो गुरू की नैसर्गिक प्रकृति बड़ी सौम्य है । गुरू अपनी अर्जित की हुई सारी चीजें चाहे वो ज्ञान हो या सम्पत्ति अपने शिष्यों और समाज कल्याण के लिए लोगों में बाँट देता है । वो स्वयं झोपड़े में रहते हुए कठिन तपस्या करता है और अपने पास आने वालों को महलों के आशीर्वाद और वरदान दे देता है । यही शुक्राचार्य ने भी किया सारी भौतिक सम्पत्तियों का स्वामित्व होने पर भी अपनी सम्पत्ति अपने शिष्यों और अनुयायियों में बाँट दी और खुद तपस्या में लीन हो गए । गुरू के मन में समाज सेवा का भाव इतना प्रबल होता है कि उसे अपने परिवार या घर की कोई खास चिंता नहीं होती उसकी प्राथमिकता उसके शिष्यों और समाज की प्रगति होती है । शायद इसीलिये ज्योतिष में गुरू ग्रह के बारे में कहा गया है कि ये जहाँ बैठता है वहाँ की वृद्धि नहीं करेगा मगर जहाँ देखेगा वहाँ की निश्चित रूप से वृद्धि करेगा ही ।
          अब आती है शनि की बात, तो शनि का स्वभाव अंतर्मुखी है, इसके स्वभाव में स्वार्थ, ईर्ष्या, कपट जैसे दुर्गुण देखने को मिलते है जिसके कारण शनि जिस घर में बैठता है पहले उसकी वृद्धि करता है और जिस घर में दृष्टि देगा उसे विनष्ट कर देगा । क्योंकि शनि दूसरे की टाँग खींचकर आगे बढ़ने वाला ग्रह है । ये सबसे ज्यादा आलसी और धीरे चलने वाला भी है इसलिये ये अपने इन दुर्गुणों के प्रभाव भी उन भावों में दे देगा जहाँ दृष्टि डालेगा । और उस भाव से संबंधित फल में विलम्ब पैदा कर देगा । शनि जहाँ बैठता है वहाँ अपने स्वार्थी स्वभाव के कारण उस भाव की वृद्धि करने लगता है उससे संबंधित फलों में शुभता देने लगता है मगर विलम्ब तो होगा ही क्योंकि शनि की रफ्तार ही धीमी है, यह आलसी भी है इसलिये फल देगा जरूर मगर आराम से ।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

दृष्टियाँ



         ज्योतिष के प्रारंभिक अध्ययन के समय हमें यह तो बताया जाता है कि किस ग्रह की कौन सी दृष्टि होती है मगर क्यों होती है और क्या होती है यह कोई नहीं बताता । ऐसे में तार्किक दृष्टिकोण वाले मेरे जैसे कई विद्यार्थी विवादित विषयों के संदर्भ में बड़ी ही असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं कि आखिर वे किस ओर जायें, किस नियम को सत्य मानते हुए आत्मसात करें । मैनें अपने अब तक के ज्योतिषीय अध्ययन में यही पाया है कि सब विवादों और नियमों को पढ़ने के बाद भी स्वयं उनका विश्लेषण करना और अपने निष्कर्ष के आधार पर ही तर्कों को स्वीकृत करना सर्वाधिक उपयुक्त होगा । यह लेख भी मेरा स्वयं का एक विश्लेषण मात्र है पाठकों के अपने मत हो सकते हैं ।
          वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव के अध्ययन के लिए उनकी दृष्टियों का अध्ययन किया जाता है, और इस प्रकार के अध्ययन के लिये सभी ग्रहों की दृष्टियों का उल्लेख ज्योतिषीय ग्रंथों में मिलता है जो कि इस प्रकार है...

ग्रह                    दृष्टियाँ

सूर्य                        ७
चंद्र                        ७
बुध                        ७
शुक्र                        ७
मंगल                      ४,७,८
गुरू                        ५,७,९
शनि                       ३,७,१०

          इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी ग्रह अपने से सप्तम भाव को तो देखते ही हैं मगर मंगल, शनि, और गुरू को कुछ विशेष दृष्टियाँ दी गई हैं । यहाँ हमने राहु और केतु की दृष्टि का कोई जिक्र नहीं किया है, क्योंकि राहु और केतु की दृष्टियों के संबंध में हमेशा ही विवाद की स्थिति बनी रही है । और इसका बड़ा ही स्वाभाविक कारण यह है कि राहु और केतु दोनो ही छाया ग्रह हैं । ये ग्रह ब्रह्माण्ड में स्थित दो संवेदनशील बिन्दु मात्र ही हैं और भौतिक रूप से ब्रह्माण्ड में स्थित नहीं हैं परंतु इन बिन्दुओं के मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण इन्हें ग्रह रूप में स्वीकार तो किया गया मगर सिर्फ छाया ग्रह ही माना गया है । कुछ ज्योतिषीय ग्रंथों में जहाँ राहु और केतु की दृष्टियों का उल्लेख मिलता है वहीं कई अन्य प्राचीन ग्रंथों में राहु और केतु की दृष्टि के संबंध में कोई बात नहीं कही गई है । इस बारे में हम विस्तृत चर्चा आगे करेंगें ।
          सर्वप्रथम यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर ये दृष्टि है क्या चीज़ ? मेरे विचार में दृष्टियाँ वास्तव में ग्रहों की परावर्तित किरणें हैं । ये किरणें ठीक उसी प्रकार हैं जैसे किसी आईने से Reflect होने वाला सूर्य का प्रकाश । ये दृष्टियाँ भी निश्चित ही ग्रह पिण्डों के माध्यम से प्रकाश का Reflection मात्र ही हैं । मगर इस Reflection के सिद्धांत में भी भेद हैं जैसे आंतरिक ग्रहों की सिर्फ सप्तम दृष्टि और बाह्य ग्रहों की विशेष दृष्टियाँ, ऐसा क्यों ? इसे जरा तार्किक दृष्टि से समझते हैं... जब हम किसी Subject को करीब से देखते हैं तो हमारा देखने का दायरा काफी सीमित होता है और ज्यों ज्यों हम उससे दूर होते चले जाते हैं त्यों त्यों दृष्टि का दायरा विस्तृत होता चला जाता है और हम उस Subject के आसपास की वस्तुओं को भी देख पाते हैं । इसी प्रकार आंतरिक ग्रह पिण्डों का दायरा सीमित होता है तथा उनकी सिर्फ सप्तम दृष्टि ही होती है । मगर जब बात बाह्य पिण्डों की होती है तब इनका दायरा बड़ा होता चला जाता  है अर्थात इनका Reflection अधिक विस्तृत क्षेत्र पर होता है और इसीलिये इन्हें विशेष दृष्टि प्रदान की गई है । यहाँ भी मंगल और गुरू का दृष्ट क्षेत्र लगभग बराबर ही होता है मगर इनकी दृष्टियों में अंतर की वजह शायद इनके अक्ष की स्थिति ही होगी, इनकी दृष्टियाँ क्रमशः ४,७,८ और ५,७,९ होती हैं अर्थात् ५ भावों तक का मगर शनि चूँकि सर्वाधिक दूर स्थित है इसलिए इसका दृष्टि क्षेत्र सर्वाधिक विस्तृत है जो कि ३रे भाव से १०वें भाव तक अर्थात् ८ भावों तक फैला होता है ।
          अब यदि राहु और केतु के विवाद की बात की जाए तो पहले इनके आधार स्वरूप को जानना चाहिये । राहु और केतु छाया ग्रह हैं कोई भौतिक पिण्ड नहीं । यदि राहु और केतु का पौराणिक कहानियों की दृष्टि से विचार किया जाए तो भी राहु सिर और केतु धड़ है इस प्रकार अगर दृष्टि हो भी तो वह सिर्फ राहु की ही होनी चाहिये केतु की नहीं । लेकिन यहाँ एक और नियम उलझन को और भी बढ़ा देता है, कुछ ग्रंथों के अनुसार राहु केतु की दृष्टि गुरू के समान होती है अर्थात् ५,७,९ । मगर ये कैसे संभव है ? ज्योतिष के प्रारंभिक अध्ययन में हमने पढ़ा है कि राहु शनि और केतु मंगल के समान होता है, तब तो अगर इनकी दृष्टि हो भी तो राहु की शनि के समान और केतु की मंगल के समान होना चाहिए, यहाँ गुरू के समान दृष्टि होना कम से कम मेरी समझ के तो परे ही है ।
          अब अगर हम अपने Reflection वाले वैज्ञानिक और तार्किक सिद्धांत की बात करें तो राहु केतु दोनों ही छाया ग्रह है ये पिण्ड रूप में हैं ही नहीं तो फिर ये किसी भी प्रकाश को परावर्तित कैसे कर सकते हैं । छाया ग्रह को और भी अधिक सूक्ष्मता से विश्लेषित किया जाए तो छाया तो उस स्थान को कहा जाता है जहाँ प्रकाश आ ही नहीं पा रहा हो और अगर प्रकाश आता तो वह स्थान छाया हो ही नहीं सकता था । इस प्रकार छाया प्रकाश का एकदम विपरीत स्वरूप है तो भी यह किसी भी तरह के प्रकाश को Reflect कैसे कर सकता है और छाया का अपना कोई Reflection नहीं होता है ।
          निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि राहु और केतु की दृष्टियाँ न होने के भरपूर तर्क हमारे पास उपलब्ध हैं और हमें भेड़ चाल न चलते हुए अपने विश्लेषण पर अधिक विश्वास करना चाहिये ।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

भावात् भावम्


                   भावात् भावम् अर्थात भाव का भाव । वैदिक ज्योतिष में भावात् भावम का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे ठीक से समझना भी बेहद जरूरी है । पहले तो यह समझना जरूरी है कि यह सिद्धांत होता क्या है और किस तरह काम में लाया जाता है । कुण्डली में किसी भी भाव से से उतने ही भाव आगे गिनने पर जो भाव आता है वह भावात् भावम के सिद्धांतानुसार उस भाव के कारकत्वों के फल देने में भी सक्षम होता है जैसे नवम् भाव पंचम से पंचम होने के कारण पंचम भाव के कारकत्वों के फल देने में भी सक्षम होता है । कुण्डली में भावात् भावम के सिद्धांत के प्रयोग से भावों के प्राथमिक कारकत्वों में कुछ द्वितीयक कारकत्व भी जुड़ जाते हैं और वे किसी भी भाव के महत्व को और भी बड़ा देते है । यहाँ कुछ भाव अपनी विशेष स्थिति के कारण एक से अधिक भावों के कारकत्वों का प्रतिनिधित्व करने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में इन विशेष भावों का विचार करते समय बड़ी ही सावधानी से विचार करना अनिवार्य हो जाता है । मेरे लिये एक समय में ये बात समझना बड़ा ही मुश्किल हो रहा था कि एकादश भाव अशुभ या पापी क्यों कहा जाता है जबकि यह लाभ भाव है और लग्न के लिये लाभ भाव बुरा कैसे हो सकता है, मगर कुछ विद्वानों ने समय समय पर तर्क दिये कि मानव का उद्देश्य ब्रह्म की ओर बढ़ना है अगर वो लाभ में उलझ जायेगा तो ये हानि ही है मगर ये बात मेरे गले के नीचे कभी ठीक से उतर नहीं सकी । ठीक इसी तरह तृतीय भाव भी छोटे भाई बहनों, मित्रों, साहस, शौक आदि का प्रतिनिधित्व करता है तो फिर ये भाव बुरा कैसे हो सकता है । मगर यूँ ही बैठे बैठे विचार करते समय मुझे समझ आ गया कि वास्तव में इसके पीछे भावात् भावम् का सिद्धांत ही है जिसके अनुसार कुछ अति महत्वपूर्ण भावों में तृतीय और एकादश भी आते हैं । ये अति महत्वपूर्ण भाव निम्न प्रकार हैं ....
प्रथम भाव‍‍‍ - प्रथम भाव प्रथम से प्रथम और सप्तम से सप्तम होता है जिसके कारण ये अतिमहत्वपूर्ण हो जाता है ।

तृतीय भाव - यह भाव द्वितीय से द्वितीय और अष्टम् से अष्टम् हो जाता है यहाँ द्वितीय भाव मारक होता है और अष्टम् भाव भी कुण्डली का रंध्र स्थान कहा जाता है । ऐसे में तृतीय भाव इन दोनों ही अशुभ भावों के कारकत्वों के साथ होने के कारण अत्यंत अशुभ हो जाता है ।

पंचम भाव - यह भाव तृतीय से तृतीय और नवम से नवम होता है । तृतीय भाव साहस का और नवम पिता और धर्म का स्थान है इस प्रकार पंचम भाव इन दोनों भावों के कारकत्व के साथ होने पर अतिमहत्वपूर्ण हो जाता है ।

सप्तम भाव - यह भाव चतुर्थ से चतुर्थ और दशम् से दशम् होता है । चतुर्थ भाव सुख का और दशम कर्म का है । सप्तम भाव केन्द्र भी है और मारक भी मगर ये अपने साथ चतुर्थ और दशम जैसे शुभ भावों के कारकत्व रखता है और अतिमहत्वपूर्ण भाव हो जाता है ।

नवम भाव - यह भाव पंचम से पंचम और एकादश से एकादश भाव होता है । पंचम भाव पूर्व पुण्यों का भाव होने के साथ ही त्रिकोण भी है तथा एकादश भाव लाभ स्थान है ही साथ में नवम् भाव स्वयं भी धर्म और भाग्य का स्थान है अतः नवम भाव कुण्डली में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है ।

एकादश भाव - यह भाव स्वयं तो लाभ स्थान है मगर दो बेहद अशुभ भावों के कारकत्व भी रखने के कारण अशुभ कहा जाता है । यह भाव षष्ठम से षष्ठम और द्वादश से द्वादश है और इसी कारण एक अशुभ और अतिमहत्वपूर्ण विचारणीय भाव है ।

                   इस तरह हम देखते हैं कि किसी भी भाव से संबंधित फलों के अध्ययन के लिये उन भावों पर भावात् भावम के सिद्धांत का प्रयोग करना बहुत ही महत्वपूर्ण है । अतः इस सिद्धांत का बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयोग फलित कथन में सटीकता प्रदान करता है ।

बुधवार, 28 नवंबर 2012

रत्न प्रयोग और भ्रांति

               कोई रत्न पहनना चाहिये या नहीं और वाकई में रत्नों का कोई असर होता भी है या नहीं ये बहुत ही पुराना विवाद रहा है कुछ लोग रत्न को सिरे से नकार देते हैं वहीं कुछ रत्नों के फल चमत्कारिक से होने की वकालत करते हैं । ऐसे में एक हम जैसे नौसीखिए बड़ी उलझन में आ जाते हैं । मेरे अपने विचार में रत्नों का असर होता तो है मगर ये किसी के प्रारब्ध को नहीं बदल सकते फिर सवाल ये कि फिर ये किस काम के ? बिल्कुल ठीक है अगर हम रत्नों को तार्किक दृष्टि से समझने की कोशिश करें तो इसका जवाब मिल सकता है ।

               रत्न वास्तव में हमारे भीतर सक्रिय ऊर्जाओं में से किसी ऊर्जा विशेष को बढ़ाने के लिये उपयोग किये जाते हैं । ऐसी ऊर्जाऐं जो हमें संचालित करती हैं और हमारे व्यक्तित्व निर्माण में अपना योगदान देती हैं और हमारी शारीरिक क्षमताओं का भी विकास करती हैं । सवाल है ऐसे में कोई रत्न क्या असर दे सकता है ? तो जवाब है कि रत्न पहनने पर जब आप किसी ऊर्जा विशेष को ताकत देते हैं तो उससे संबंधित क्रिया में वृद्धि होती है जो आपके व्यक्तित्व में परिवर्तन लाती है और शारीरिक रूप से भी आपकी संबंधित ऊर्जा द्वारा नियंत्रित क्षमताओं में परिवर्तन लाती हैं । इसका मतलब ये हुआ कि रत्न प्रारब्ध में कोई हस्तक्षेप नहीं करते वरन् हमारे व्यक्तित्व में परिवर्तन लाकर हमारे वांछित कार्य संबंधित कर्म करने के लिए प्रेरित करते हैं । इसे एक उदाहरण से समझने में आसानी होगी... मान लीजिये किसी व्यक्ति के भीतर मंगल की ऊर्जा अधिक मात्रा में है और इसी कारण से उसे गुस्सा ज्यादा आता है वो शॉर्ट टेम्पर्ड नेचर का है अब यहाँ रत्न का असर किस तरह होगा... अगर ऐसे व्यक्ति को मंगल का रत्न पहना दिया जाए तो उसके गुस्से में इज़ाफा ही होगा और अगर मंगल कुण्डली में किसी बेहद अच्छे भाव का प्रतिनिधित्व भी करता है तो ऐसे में उसे अन्य प्रयोगों द्वारा कमजोर करना भी गलत ही होगा तब अगर विपरीत प्रवृत्ति के ग्रह चंद्र का रत्न पहनाकर चंद्र की शांत और सौम्य करने वाली ऊर्जाओं को बढ़ा दिया जाए तो काम बन सकता है । या अगर किसी के शरीर में कैल्शियम की कमी है तो उसे मोती पहनाया जा सकता है जो कैल्शियम की मात्रा को बढ़ने में मदद करता है ।

रत्नों द्वारा प्रारब्ध में परिवर्तन क्यों संभव नहीं ?
प्रारब्ध किसी का भी हो ये जरूरी नहीं कि वो सिर्फ उस व्यक्ति विशेष तक ही सीमित हो । हम सभी के प्रारब्ध एक दूसरे से जुड़े हुए होते हैं जैसे किसी वाहन दुर्घटना के शिकार दो व्यक्तियों का प्रारब्ध उन्हें एक ही जगह ले आता है और फिर उनका इलाज करने वाले डॉक्टर का प्रारब्ध, उनके क्षतिग्रस्त हो चुके वाहनों को ठीक करने वाले का प्रारब्ध आदि आदि । अब यहाँ रत्नों के माध्यम से प्रारब्ध को बदलने का दावा करने वाले विद्वान किस तरह गलत सिद्ध होते हैं । माना कि राम और श्याम दोनों का ये प्रारब्ध है कि आज दोपहर ३ बजे उनका आपस में ऐक्सीडेंट होना है । किसी विद्वान ने पहले ही राम की कुण्डली देखकर इस घटना का पूर्वानुमान लगाया और उपचार स्वरूप एक रत्न पहना दिया । लेकिन फिर भी वो दुर्घटना को टाल नहीं सके कारण साफ था श्याम ने कोई उपचार नहीं किया था और अगर किया भी होता तो उस डॉक्टर की फीस जो उसका प्रारब्ध थी और उस मैकेनिक का प्रारब्ध और भी उन सभी लोगो का प्रारब्ध जो इस दुर्घटना से जुड़ा हुआ था बदल पाना संभव नहीं हो सकता ।

               इस तरह हम देखते हैं कि रत्नों का प्रयोग किया तो जा सकता है लेकिन उनके कार्य का अपना सीमित क्षेत्र है । और इन ऊर्जाओं में परिवर्तन लाने के लिये रत्न ही एकमात्र उपाय नहीं हैं बल्कि और भी उपाय हैं जैसे रूद्राक्ष धारण करना, मंत्र जप, ऊर्जाओं से संबंधित पेड़ पौधों की जड़ों का प्रयोग करना, ऊर्जाओं से संबंधित रंग की बोतलों में रखे पानी का प्रयोग करना, औरा हीलिंग, आदि अन्य कई और भी उपाय हो सकते हैं जो अभी मेरी जानकारी में भी नहीं हैं ।

उपरोक्त लिखित सारी बातें मेरी सीमित बुद्धि की उपज हैं अतः किसी भी गलती के लिये मैं स्वयं उत्तरदायी हूँ । और अपनी गलतियों के लिये क्षमा तथा सुधार हेतु सुझाव का प्रार्थी हूँ ।

धन्यवाद !