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सोमवार, 15 जून 2015

बुद्ध !


बुद्ध !

बुद्ध तुम महान हो गए
सजावट का सामान हो गए

कभी दीवार पर टंगे गहन ध्यान में,
कभी शो केस पर लेटे बड़े आराम में,
किसी के गले में पड़े हुए
फैशन की पहचान हो गए,
अरे बुद्ध तुम तो, बड़े महान हो गए ।

मांस और मदिरा सब,
तुम्हारे सामने चलता है,
दूसरों का
टकटकी लगाकर देखना खलता है।

प्रेमी की बाहों में पड़ी बालाएं भी,
तुमसे खौफ नहीं खाती,
तुम्हारी मुंदी हुई आँखे ही,
सबको रास आती ।
बिस्तर में लौटती सुबह,
तो कभी रंगीन शाम हो गए,
हे बुद्ध ! तुम तो वाकई बहुत महान हो गए ।

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

इस बरसात में...

इस बरसात में...

मैंने देखा
कुछ बूँदें छोटी छोटी सी
बड़े अहतियात के साथ
उतरी एक पत्ते पे
और फिर धीरे से लुढ़क के
मिट्टी में कहीं खो गई... !

इस बरसात में...

मैंने देखा
पत्तों की ओट में छिपी
छोटी सी गौरैया
अपने नन्हे से पंख फैलाकर
दे रही थी छाँव
अपने बच्चे को... !

इस बरसात में...

मैंने देखा
कुछ बच्चे निकल पड़े थे
झरनों की तलाश में
अपने पापा के कांधों पर
होकर के सवार...!

इस बरसात में...

मैंने देखा
उसकी छत से टपकता पानी
रात रात भर जगाता था उसे
और सारा दिन बीत जाता
छप्पर पे पैबंद लगाने में...!

इस बरसात में...

मैंने देखा
कुछ अमीरज़ादों को
काँच बंद गाड़ी में बैठकर
सड़क किनारे खड़े
किसी गरीब पर
कीचड़ उछालकर
ठहाके लगाते हुए...!

अभी और भी कारनामें होंगे
बरसात अभी बाकि है बहुत...


शुक्रवार, 14 जून 2013

एक छोटा सा पौधा...


एक छोटा सा पौधा
दिल में बड़े अरमान लिये
बढ़ता है अपनी बाँहें फैलाये
आसमान की ओर ।

एक छोटा सा पौधा
मन में प्यार लिये
धीरे धीरे से
पसारता है अपने पाँव
मिट्टी की परतों तले ।

एक छोटा सा पौधा
बुलाता है कुछ तितलियों को
मुस्कुराकर अपने पास
कहता है जीवन की बात
कुछ खास ।

एक छोटा सा पौधा
कुचल दिया जाता है
कुछ बेपरवाह कदमों के तले
और हो जाता है खामोश
बिना किसी शोर के...
बिना किसी जोर के.....

बुधवार, 21 नवंबर 2012

मेरे शहर के लोग...

मेरे शहर के लोग अब,
हिन्दू औ' मुसलमान हो गए

पहले धर्म ग्रंथ थे,
अब गीता कुरान हो गए,

बदलने लगी आबो हवा इस तरह
मोहल्ले हिन्दुस्तान पाकिस्तान हो गए,

खेल के मैदान में तलवारें खिंचनें लगी
यारी दोस्ती, प्यार मोहब्बत लहुलुहान हो गए

खुदा जाने इस गर्दिश में इंसान कहाँ खो गए
भगवान जाने इस भीड़ में इंसान कहाँ खो गए...
                                               - विश्वास शर्मा


(२००७ में मेरे शहर नरसिंहगढ़ में हनुमान जयंती पर हुए साम्प्रदायिक दंगे के वक्त १८ फरवरी २००७ को लिखी गई ।)


सोमवार, 29 अक्टूबर 2012

श्री विशु देव पैंतीसा

जय जय जय विशु देव अति ज्ञानी ।
      बुद्धि     तुमरी    अति   सयानी  ।। १।।

सहज  भाव   से   तुम  हो   आये ।
      सहज   स्वभाव   ही  तुमने  पाये ।।२।।

शिशुकाल   जब   सब   रोते  हैं ।
      तुमने   कम  न  भौकड़े जोते  हैं ।।३।।

नाम  "विश्वास"  है तुमने  पाया ।
       बाल्यकाल    "लालू"    कहलाया ।।४।।

जब हुआ जन को ज्ञान प्रभु का ।
        "लालू"  से  "विशु"  नाम कराया ।।५।।

 बचपन   से  तुम  अत्यंत  भोले ।
       किसी  से  कुछ भी कम ही बोले ।।६।।

  तुम्हरी महिमा कोई जान न पाया ।
        अजब    निराली   तुम्हरी  माया ।।७।।
 


 सब   संकट   के  तुम   हो   करता ।
      दुःख   का  गड्ढा   न  तुमसे  भरता ।।८।।

तुमने    पाई    अद्भुत    काया ।
     मोमबत्ती   की   हो  तुम  छाया ।।९।।

तुम्हरे  वचन   न  जन   मन  भाते ।
         कम  ही   लोग   सहन    कर   पाते ।।१०।।

प्रभु    स्वयंभू     तुम     कहलाये ।
        नाम के  आगे  "महाराज" लगाये ।।११।।

तुमसे    कोई     पार    न     पावे ।
         राय  तुम्हें  न   किसी  की   भावे ।।१२।।

वेद   पुराण     न    तुमने    बाँचे ।
        कुटिल   बुद्धि  से  सब  को  जाँचे ।।१३।।

तुम्हरी  लीला   समझ   न   आई ।
         जब   हुई    तुमसे   कौनु  भलाई ।।१४।।

चरण  फचाकड़ा  तुमने  पाये ।
          धोने     वाले    भी    पछतायें ।।१५।।

ध्वनि तुम्हारी अति  मधुर  है ।
         जैसे   कोई    कौवा   चिल्लाये ।।१६।।

फूल तुम्हें  बेशरम  का भाये ।
         अगरबत्ती    से   मन   हर्षाये ।।१७।।

  तुम्हरी किरपा  जिन  पर होई ।
           तिन पर किरपा करे नहीं कोई ।।१८।।

आलस  को  तुम शीश  धरे ।
        फिर   कोई   कुछ   भी  करे ।।१९।।

कहते "सनकी" लोग  तुम्हें ।
        जान गये  जो  इस लोक में ।।२०।।

पेड़  पौधे  पंछी  सब प्यारे ।
         तुमको  अपने  लगते सारे ।।२१।।

लौकी  कद्दू   तुम्हें   न   भावे ।
        आलू   तुमको   बहुत   लुभावे ।।२२।।

तुमरा   न    है    कोई   ठिकाना ।
        कब    कहाँ   हो   किसने   जाना ।।२३।।

जग में जगह  न  कोई भाये ।
         नरसिंहगढ़  ही  धाम लगाये ।।२४।।

भूख  प्यास से न कोई नाता ।
        पानी  तुमको  खूब  सताता ।।२५।।

तुम्हरे भजन जो नित्य करे ।
         उसे     रोज़   सौ   जूते   पड़ें ।।२६।।

तुमसे  बड़ा   न   कोई  ज्ञानी ।
          जग  में गूँजे ये   झूठी कहानी ।।२७।।

    बिपदा  तब  भक्तन   पे  आये ।
            जब कोई तुमरा ध्यान लगाये ।।२८।।

बात दिल में रखे नहीं कोई ।
         विशु  देव  सा  देव  न  होई ।।२९।।

  विशु  देव  को  जो  कोई ध्यावे ।
           सब संकट विकराल होई जावे ।।३०।।

 सकल सनातन  संकट करता ।
          तुम सी कोई न हरकत करता ।।३१।।

जय जय विशु नाम परम पुनीता ।
          दो   अक्षर  सब   गुन   से    रीता ।।३२।।

  ये    अद्भुत    अचूक  उपाय ।
            सब सुख साधन दूर भगाए ।।३३।।

जो   कोई   लेवे   नाम   प्रभु  का ।
        बिगड़े   बनता   काम   सबहु  का ।।३४।।

पूजत जो उसे मिले न मेवा ।
         ऐसे   मेरे  प्रभु   विशु   देवा ।।३५।।

।। देव दोहा ।।
जो   नर    नारी    नित्य   इस,  पैंतीसा    को   पाठ   करे ।
नींद  हराम हो जाए रात  की, दिन  में सबकी गालियाँ पड़े ।।

(एक बार बाज़ार में एक संत कहे जाने वाले ढोंगी प्रवचनकारी (मेरी नज़र में )की चालीसा देखकर मेरे मन अपनी भी एक पैंतीसा लिखने की इच्छा हुई और २२ जुलाई २००६ से ३१जुलाई २००६ के बीच ये पैंतीसा लिखी गई ।)

शुक्रवार, 19 अक्टूबर 2012

मेरी माँ

( नवरात्र में माँ को समर्पित )

मैं देखता हूँ
वो बरसों से,
हर सुबह
सबसे पहले जाग जाती है,
सारे घर की सफाई के बाद नहाती
और फिर खाना बनाती है,
हम सब की कुशल क्षेम के लिए
घंटों तक फिर
भगवान को मनाती है,
और सबको खिलाने के बाद आखिर में
रात की बची
ठण्डी रोटियाँ खाती है,
जो दोस्तों के साथ
किसी रेस्तराँ में
जन्मदिन का जश्न मनाने के बाद,
हमने नहीं खाई थी ।
मगर कभी भी
कोई शिकायत नहीं करती ।

जिसकी अपनी कोई चाह नहीं,
और कभी कोई आह भी नहीं ।
बिना कुछ कहे वो सबकुछ सहती है
न जाने कैसे लेकिन
फिर भी खुश रहती है ।
ज़रा नमक कम पड़ जाने पर
साग में,
हमारी तीखी बातों को भी
मुस्कुराकर लेती है,
सोंचता हूँ कैसे
वो इतना कुछ करती है
हर बात, हर हालात को
चुपचाप सहती है ।

किसी बात फरमाइश पर जिसकी
कोई ना न सुनी
किसी बात को टालने जिसने
कभी कोई कहानी नहीं बुनी ।

जिसे अपनी छोड़
सबकी परवाह है,
हाँ हाँ सिर्फ हाँ
हर माँग पर
हर हाल में
जिसकी सिर्फ हाँ है
वो ही तो मेरी माँ है
हाँ वो ही तो मेरी माँ है...!

--विश्वास शर्मा