सोमवार, 15 जून 2015

बुद्ध !


बुद्ध !

बुद्ध तुम महान हो गए
सजावट का सामान हो गए

कभी दीवार पर टंगे गहन ध्यान में,
कभी शो केस पर लेटे बड़े आराम में,
किसी के गले में पड़े हुए
फैशन की पहचान हो गए,
अरे बुद्ध तुम तो, बड़े महान हो गए ।

मांस और मदिरा सब,
तुम्हारे सामने चलता है,
दूसरों का
टकटकी लगाकर देखना खलता है।

प्रेमी की बाहों में पड़ी बालाएं भी,
तुमसे खौफ नहीं खाती,
तुम्हारी मुंदी हुई आँखे ही,
सबको रास आती ।
बिस्तर में लौटती सुबह,
तो कभी रंगीन शाम हो गए,
हे बुद्ध ! तुम तो वाकई बहुत महान हो गए ।

मंगलवार, 26 मई 2015

ग्रीष्म

हे ग्रीष्म !
तुम नाराज़ हो बहुत
अब के बरस
मैं समझता हूँ
इस नाराज़गी का कारण भी
बरसती बूंदों ने जो अतिक्रमण किया है
तुम पर,
मगर अब हर बून्द
तुम सुखा चुकी
तुम्हारा बदला पूरा हुआ
अब नवीन सृजन के लिए
तुम्हारा शांत होना ही
प्रकृति का नियम है
और निर्दोष जीवों की प्रार्थना भी
यदि सम्भव हो सके
तो अपने क्रोध को ज़रा कम करना
ज़रा संयम करना ।

गुरुवार, 4 जुलाई 2013

इस बरसात में...

इस बरसात में...

मैंने देखा
कुछ बूँदें छोटी छोटी सी
बड़े अहतियात के साथ
उतरी एक पत्ते पे
और फिर धीरे से लुढ़क के
मिट्टी में कहीं खो गई... !

इस बरसात में...

मैंने देखा
पत्तों की ओट में छिपी
छोटी सी गौरैया
अपने नन्हे से पंख फैलाकर
दे रही थी छाँव
अपने बच्चे को... !

इस बरसात में...

मैंने देखा
कुछ बच्चे निकल पड़े थे
झरनों की तलाश में
अपने पापा के कांधों पर
होकर के सवार...!

इस बरसात में...

मैंने देखा
उसकी छत से टपकता पानी
रात रात भर जगाता था उसे
और सारा दिन बीत जाता
छप्पर पे पैबंद लगाने में...!

इस बरसात में...

मैंने देखा
कुछ अमीरज़ादों को
काँच बंद गाड़ी में बैठकर
सड़क किनारे खड़े
किसी गरीब पर
कीचड़ उछालकर
ठहाके लगाते हुए...!

अभी और भी कारनामें होंगे
बरसात अभी बाकि है बहुत...


शुक्रवार, 14 जून 2013

एक छोटा सा पौधा...


एक छोटा सा पौधा
दिल में बड़े अरमान लिये
बढ़ता है अपनी बाँहें फैलाये
आसमान की ओर ।

एक छोटा सा पौधा
मन में प्यार लिये
धीरे धीरे से
पसारता है अपने पाँव
मिट्टी की परतों तले ।

एक छोटा सा पौधा
बुलाता है कुछ तितलियों को
मुस्कुराकर अपने पास
कहता है जीवन की बात
कुछ खास ।

एक छोटा सा पौधा
कुचल दिया जाता है
कुछ बेपरवाह कदमों के तले
और हो जाता है खामोश
बिना किसी शोर के...
बिना किसी जोर के.....

बुधवार, 2 जनवरी 2013

गुरू और शनि



कहा जाता है कि गुरू जहाँ बैठता है वहाँ के अच्छे फल नहीं देता मगर जहाँ देखता है उन भावों के फलों की शुभता में वृद्धि करता है । ज्योतिष में गुरू की दृष्टि को अमृत के समान माना गया है । वहीं शनि के बारे में कहा जाता है कि शनि जहाँ भी बैठता है उस भाव को बढ़ाता है मगर जहाँ दृष्टि डालता है वहाँ अपने विनाशकारी प्रभाव देता है या कहें की उस भाव से संबंधित शुभ फलों में कमी करता है और अशुभता की वृद्धि करता है । ज्योतिष का ये नियम प्रायः देखने सुनने में आता रहता है मगर इसके पीछे मूल कारण क्या हो सकता है ये कोई नहीं बताता । मैनें पाया कि अगर हमें इस प्रश्न का सही जवाब चाहिये तो इसके मुख्य तत्वों गुरू और शनि के मूल स्वभाव की पड़ताल की जानी बेहद जरूरी है और महत्वपूर्ण भी । अगर हम गुरु और शनि की नैसर्गिक प्रकृति को ध्यान में रखें तो हमें इसका जवाब आसानी से मिल सकता है ।
          पहले गुरू की बात करें तो गुरू की नैसर्गिक प्रकृति बड़ी सौम्य है । गुरू अपनी अर्जित की हुई सारी चीजें चाहे वो ज्ञान हो या सम्पत्ति अपने शिष्यों और समाज कल्याण के लिए लोगों में बाँट देता है । वो स्वयं झोपड़े में रहते हुए कठिन तपस्या करता है और अपने पास आने वालों को महलों के आशीर्वाद और वरदान दे देता है । यही शुक्राचार्य ने भी किया सारी भौतिक सम्पत्तियों का स्वामित्व होने पर भी अपनी सम्पत्ति अपने शिष्यों और अनुयायियों में बाँट दी और खुद तपस्या में लीन हो गए । गुरू के मन में समाज सेवा का भाव इतना प्रबल होता है कि उसे अपने परिवार या घर की कोई खास चिंता नहीं होती उसकी प्राथमिकता उसके शिष्यों और समाज की प्रगति होती है । शायद इसीलिये ज्योतिष में गुरू ग्रह के बारे में कहा गया है कि ये जहाँ बैठता है वहाँ की वृद्धि नहीं करेगा मगर जहाँ देखेगा वहाँ की निश्चित रूप से वृद्धि करेगा ही ।
          अब आती है शनि की बात, तो शनि का स्वभाव अंतर्मुखी है, इसके स्वभाव में स्वार्थ, ईर्ष्या, कपट जैसे दुर्गुण देखने को मिलते है जिसके कारण शनि जिस घर में बैठता है पहले उसकी वृद्धि करता है और जिस घर में दृष्टि देगा उसे विनष्ट कर देगा । क्योंकि शनि दूसरे की टाँग खींचकर आगे बढ़ने वाला ग्रह है । ये सबसे ज्यादा आलसी और धीरे चलने वाला भी है इसलिये ये अपने इन दुर्गुणों के प्रभाव भी उन भावों में दे देगा जहाँ दृष्टि डालेगा । और उस भाव से संबंधित फल में विलम्ब पैदा कर देगा । शनि जहाँ बैठता है वहाँ अपने स्वार्थी स्वभाव के कारण उस भाव की वृद्धि करने लगता है उससे संबंधित फलों में शुभता देने लगता है मगर विलम्ब तो होगा ही क्योंकि शनि की रफ्तार ही धीमी है, यह आलसी भी है इसलिये फल देगा जरूर मगर आराम से ।

शुक्रवार, 28 दिसंबर 2012

दृष्टियाँ



         ज्योतिष के प्रारंभिक अध्ययन के समय हमें यह तो बताया जाता है कि किस ग्रह की कौन सी दृष्टि होती है मगर क्यों होती है और क्या होती है यह कोई नहीं बताता । ऐसे में तार्किक दृष्टिकोण वाले मेरे जैसे कई विद्यार्थी विवादित विषयों के संदर्भ में बड़ी ही असमंजस की स्थिति में आ जाते हैं कि आखिर वे किस ओर जायें, किस नियम को सत्य मानते हुए आत्मसात करें । मैनें अपने अब तक के ज्योतिषीय अध्ययन में यही पाया है कि सब विवादों और नियमों को पढ़ने के बाद भी स्वयं उनका विश्लेषण करना और अपने निष्कर्ष के आधार पर ही तर्कों को स्वीकृत करना सर्वाधिक उपयुक्त होगा । यह लेख भी मेरा स्वयं का एक विश्लेषण मात्र है पाठकों के अपने मत हो सकते हैं ।
          वैदिक ज्योतिष में ग्रहों के प्रभाव के अध्ययन के लिए उनकी दृष्टियों का अध्ययन किया जाता है, और इस प्रकार के अध्ययन के लिये सभी ग्रहों की दृष्टियों का उल्लेख ज्योतिषीय ग्रंथों में मिलता है जो कि इस प्रकार है...

ग्रह                    दृष्टियाँ

सूर्य                        ७
चंद्र                        ७
बुध                        ७
शुक्र                        ७
मंगल                      ४,७,८
गुरू                        ५,७,९
शनि                       ३,७,१०

          इस प्रकार हम देखते हैं कि सभी ग्रह अपने से सप्तम भाव को तो देखते ही हैं मगर मंगल, शनि, और गुरू को कुछ विशेष दृष्टियाँ दी गई हैं । यहाँ हमने राहु और केतु की दृष्टि का कोई जिक्र नहीं किया है, क्योंकि राहु और केतु की दृष्टियों के संबंध में हमेशा ही विवाद की स्थिति बनी रही है । और इसका बड़ा ही स्वाभाविक कारण यह है कि राहु और केतु दोनो ही छाया ग्रह हैं । ये ग्रह ब्रह्माण्ड में स्थित दो संवेदनशील बिन्दु मात्र ही हैं और भौतिक रूप से ब्रह्माण्ड में स्थित नहीं हैं परंतु इन बिन्दुओं के मानव जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव के कारण इन्हें ग्रह रूप में स्वीकार तो किया गया मगर सिर्फ छाया ग्रह ही माना गया है । कुछ ज्योतिषीय ग्रंथों में जहाँ राहु और केतु की दृष्टियों का उल्लेख मिलता है वहीं कई अन्य प्राचीन ग्रंथों में राहु और केतु की दृष्टि के संबंध में कोई बात नहीं कही गई है । इस बारे में हम विस्तृत चर्चा आगे करेंगें ।
          सर्वप्रथम यह समझना बेहद जरूरी है कि आखिर ये दृष्टि है क्या चीज़ ? मेरे विचार में दृष्टियाँ वास्तव में ग्रहों की परावर्तित किरणें हैं । ये किरणें ठीक उसी प्रकार हैं जैसे किसी आईने से Reflect होने वाला सूर्य का प्रकाश । ये दृष्टियाँ भी निश्चित ही ग्रह पिण्डों के माध्यम से प्रकाश का Reflection मात्र ही हैं । मगर इस Reflection के सिद्धांत में भी भेद हैं जैसे आंतरिक ग्रहों की सिर्फ सप्तम दृष्टि और बाह्य ग्रहों की विशेष दृष्टियाँ, ऐसा क्यों ? इसे जरा तार्किक दृष्टि से समझते हैं... जब हम किसी Subject को करीब से देखते हैं तो हमारा देखने का दायरा काफी सीमित होता है और ज्यों ज्यों हम उससे दूर होते चले जाते हैं त्यों त्यों दृष्टि का दायरा विस्तृत होता चला जाता है और हम उस Subject के आसपास की वस्तुओं को भी देख पाते हैं । इसी प्रकार आंतरिक ग्रह पिण्डों का दायरा सीमित होता है तथा उनकी सिर्फ सप्तम दृष्टि ही होती है । मगर जब बात बाह्य पिण्डों की होती है तब इनका दायरा बड़ा होता चला जाता  है अर्थात इनका Reflection अधिक विस्तृत क्षेत्र पर होता है और इसीलिये इन्हें विशेष दृष्टि प्रदान की गई है । यहाँ भी मंगल और गुरू का दृष्ट क्षेत्र लगभग बराबर ही होता है मगर इनकी दृष्टियों में अंतर की वजह शायद इनके अक्ष की स्थिति ही होगी, इनकी दृष्टियाँ क्रमशः ४,७,८ और ५,७,९ होती हैं अर्थात् ५ भावों तक का मगर शनि चूँकि सर्वाधिक दूर स्थित है इसलिए इसका दृष्टि क्षेत्र सर्वाधिक विस्तृत है जो कि ३रे भाव से १०वें भाव तक अर्थात् ८ भावों तक फैला होता है ।
          अब यदि राहु और केतु के विवाद की बात की जाए तो पहले इनके आधार स्वरूप को जानना चाहिये । राहु और केतु छाया ग्रह हैं कोई भौतिक पिण्ड नहीं । यदि राहु और केतु का पौराणिक कहानियों की दृष्टि से विचार किया जाए तो भी राहु सिर और केतु धड़ है इस प्रकार अगर दृष्टि हो भी तो वह सिर्फ राहु की ही होनी चाहिये केतु की नहीं । लेकिन यहाँ एक और नियम उलझन को और भी बढ़ा देता है, कुछ ग्रंथों के अनुसार राहु केतु की दृष्टि गुरू के समान होती है अर्थात् ५,७,९ । मगर ये कैसे संभव है ? ज्योतिष के प्रारंभिक अध्ययन में हमने पढ़ा है कि राहु शनि और केतु मंगल के समान होता है, तब तो अगर इनकी दृष्टि हो भी तो राहु की शनि के समान और केतु की मंगल के समान होना चाहिए, यहाँ गुरू के समान दृष्टि होना कम से कम मेरी समझ के तो परे ही है ।
          अब अगर हम अपने Reflection वाले वैज्ञानिक और तार्किक सिद्धांत की बात करें तो राहु केतु दोनों ही छाया ग्रह है ये पिण्ड रूप में हैं ही नहीं तो फिर ये किसी भी प्रकाश को परावर्तित कैसे कर सकते हैं । छाया ग्रह को और भी अधिक सूक्ष्मता से विश्लेषित किया जाए तो छाया तो उस स्थान को कहा जाता है जहाँ प्रकाश आ ही नहीं पा रहा हो और अगर प्रकाश आता तो वह स्थान छाया हो ही नहीं सकता था । इस प्रकार छाया प्रकाश का एकदम विपरीत स्वरूप है तो भी यह किसी भी तरह के प्रकाश को Reflect कैसे कर सकता है और छाया का अपना कोई Reflection नहीं होता है ।
          निष्कर्षतः हम कह सकते हैं कि राहु और केतु की दृष्टियाँ न होने के भरपूर तर्क हमारे पास उपलब्ध हैं और हमें भेड़ चाल न चलते हुए अपने विश्लेषण पर अधिक विश्वास करना चाहिये ।

गुरुवार, 27 दिसंबर 2012

भावात् भावम्


                   भावात् भावम् अर्थात भाव का भाव । वैदिक ज्योतिष में भावात् भावम का सिद्धांत अत्यंत महत्वपूर्ण है और इसे ठीक से समझना भी बेहद जरूरी है । पहले तो यह समझना जरूरी है कि यह सिद्धांत होता क्या है और किस तरह काम में लाया जाता है । कुण्डली में किसी भी भाव से से उतने ही भाव आगे गिनने पर जो भाव आता है वह भावात् भावम के सिद्धांतानुसार उस भाव के कारकत्वों के फल देने में भी सक्षम होता है जैसे नवम् भाव पंचम से पंचम होने के कारण पंचम भाव के कारकत्वों के फल देने में भी सक्षम होता है । कुण्डली में भावात् भावम के सिद्धांत के प्रयोग से भावों के प्राथमिक कारकत्वों में कुछ द्वितीयक कारकत्व भी जुड़ जाते हैं और वे किसी भी भाव के महत्व को और भी बड़ा देते है । यहाँ कुछ भाव अपनी विशेष स्थिति के कारण एक से अधिक भावों के कारकत्वों का प्रतिनिधित्व करने के कारण अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाते हैं और ऐसी स्थिति में इन विशेष भावों का विचार करते समय बड़ी ही सावधानी से विचार करना अनिवार्य हो जाता है । मेरे लिये एक समय में ये बात समझना बड़ा ही मुश्किल हो रहा था कि एकादश भाव अशुभ या पापी क्यों कहा जाता है जबकि यह लाभ भाव है और लग्न के लिये लाभ भाव बुरा कैसे हो सकता है, मगर कुछ विद्वानों ने समय समय पर तर्क दिये कि मानव का उद्देश्य ब्रह्म की ओर बढ़ना है अगर वो लाभ में उलझ जायेगा तो ये हानि ही है मगर ये बात मेरे गले के नीचे कभी ठीक से उतर नहीं सकी । ठीक इसी तरह तृतीय भाव भी छोटे भाई बहनों, मित्रों, साहस, शौक आदि का प्रतिनिधित्व करता है तो फिर ये भाव बुरा कैसे हो सकता है । मगर यूँ ही बैठे बैठे विचार करते समय मुझे समझ आ गया कि वास्तव में इसके पीछे भावात् भावम् का सिद्धांत ही है जिसके अनुसार कुछ अति महत्वपूर्ण भावों में तृतीय और एकादश भी आते हैं । ये अति महत्वपूर्ण भाव निम्न प्रकार हैं ....
प्रथम भाव‍‍‍ - प्रथम भाव प्रथम से प्रथम और सप्तम से सप्तम होता है जिसके कारण ये अतिमहत्वपूर्ण हो जाता है ।

तृतीय भाव - यह भाव द्वितीय से द्वितीय और अष्टम् से अष्टम् हो जाता है यहाँ द्वितीय भाव मारक होता है और अष्टम् भाव भी कुण्डली का रंध्र स्थान कहा जाता है । ऐसे में तृतीय भाव इन दोनों ही अशुभ भावों के कारकत्वों के साथ होने के कारण अत्यंत अशुभ हो जाता है ।

पंचम भाव - यह भाव तृतीय से तृतीय और नवम से नवम होता है । तृतीय भाव साहस का और नवम पिता और धर्म का स्थान है इस प्रकार पंचम भाव इन दोनों भावों के कारकत्व के साथ होने पर अतिमहत्वपूर्ण हो जाता है ।

सप्तम भाव - यह भाव चतुर्थ से चतुर्थ और दशम् से दशम् होता है । चतुर्थ भाव सुख का और दशम कर्म का है । सप्तम भाव केन्द्र भी है और मारक भी मगर ये अपने साथ चतुर्थ और दशम जैसे शुभ भावों के कारकत्व रखता है और अतिमहत्वपूर्ण भाव हो जाता है ।

नवम भाव - यह भाव पंचम से पंचम और एकादश से एकादश भाव होता है । पंचम भाव पूर्व पुण्यों का भाव होने के साथ ही त्रिकोण भी है तथा एकादश भाव लाभ स्थान है ही साथ में नवम् भाव स्वयं भी धर्म और भाग्य का स्थान है अतः नवम भाव कुण्डली में बेहद महत्वपूर्ण हो जाता है ।

एकादश भाव - यह भाव स्वयं तो लाभ स्थान है मगर दो बेहद अशुभ भावों के कारकत्व भी रखने के कारण अशुभ कहा जाता है । यह भाव षष्ठम से षष्ठम और द्वादश से द्वादश है और इसी कारण एक अशुभ और अतिमहत्वपूर्ण विचारणीय भाव है ।

                   इस तरह हम देखते हैं कि किसी भी भाव से संबंधित फलों के अध्ययन के लिये उन भावों पर भावात् भावम के सिद्धांत का प्रयोग करना बहुत ही महत्वपूर्ण है । अतः इस सिद्धांत का बुद्धिमत्तापूर्ण प्रयोग फलित कथन में सटीकता प्रदान करता है ।