अव्यक्त…! वास्तव में अव्यक्त एक प्रदर्शनी है मेरे विचारों की, अक्सर मेरे भीतर कई विषयों को लेकर उठने वाले ज्वार भाटे को मैं महसूस करता हूँ, मगर ये मेरे भीतर ही जन्म लेता और खत्म हो जाता है कभी कभी कुछ बेहद संवेदनशील और आक्रोशित होता है तो कभी एक गंभीर और शांत दार्शनिक की तरह । इन्हीं कुछ परेशानियों के चलते इस "अव्यक्त" ज्वार भाटे को ब्लाग के रूप में आप सभी के समक्ष व्यक्त करने का मेरा प्रयास ही "अव्यक्त" है ।
बुधवार, 25 दिसंबर 2019
बदलते रहे
गुरुवार, 20 जून 2019
रिश्ते
रिश्ते प्लास्टिक के तिरपाल की तरह होते हैं जो आपकी मूसलाधार बारिश से सुरक्षा करते हैं लेकिन वक्त की धूप के साथ पलते जाते हैं और फैल जाते है एक नज़र देखने में लगता है कि ये बृहद हो रहे हैं जबकि इनका आपसी तालमेल कमजोर होता जाता है और फिर अपने अपने अहंकार के मौसम की मार पड़ते पड़ते अंततः फट जाते हैं । और फिर कभी पहले की तरह नहीं हो पाते...
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे पे फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ी जाय ।
मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018
जन्मपत्रिका में शनि विचार
शनिवार, 9 सितंबर 2017
दास्तान ए देवालय 1 मंदिर श्री रघुनाथ जी नरसिंहगढ़
- मंदिर की स्थापना का समय
सन् 1761 में मोती सिंह जी महाराज द्वारा बताया जाता है जबकि जब मैनें नरसिंहगढ़
के इतिहास को थोड़ा खंगाला तब पता चला कि मोती सिंह जी महाराज की मृत्यु सन् 1751 में हो गई थी यानि रघुनाथ जी मंदिर की स्थापना के 10 वर्ष पूर्व, और 1761 में
नरसिंहगढ़ के राजा महाराज खुमान सिंह जी थे । जिन्होनें 1751 से 1766 तक राजकार्य
संभाला । निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मंदिर के निर्माण का कार्य मोती सिंह जी
महाराज के समय में शुरु हो चुका हो लेकिन कार्य पूर्ण होने के पहले ही उनकी मृत्यु
हो गई हो तथा बाद में उनके पुत्र महाराज खुमान सिंह जी के कार्यकाल में मंदिर
स्थापित तो हुआ लेकिन मोतीसिंह जी महाराज का ही नाम शिलालेख पर लिखवाया गया ।
- दूसरी एक बात जो मंदिर के
संबंध में कही गई है वो ये कि महाराज मोती सिंह ने अपने स्वप्न के आधार पर बावड़ी
से प्रतिमाऐं निकालने के लिये भोपाल रियासत की तत्कालीन महिला शासक से अनुमति
ली थी । जब मैनें इस बारे में कुछ खोज की तब पता चला कि भोपाल रियासत में सन् 1819 से 1926 तक 4 बेगमों ने शासन किया था लेकिन फिर भी ये वक्त प्रतिमाओं के
निकलने के वक्त से मेल नहीं खाता । 1761 में मंदिर की स्थापना हुई और अगर मोती
सिंह जी महाराज ने ही प्रतिमाओं के संबंध में स्वप्न देखा था तो उनकी मृत्यु यानि 1751 के पहले का ही कोई समय हो सकता है । भोपाल में सन् 1742 से 1777 तक नवाब
फैज़ मोहम्मद खान ने शासन किया और उन्होंने ही भोपाल रियासत की राजधानी इस्लामनगर
से भोपाल स्थानांतरित करवाई थी । लेकिन यहाँ पर फिर से एक संशय उत्पन्न होता है
कि इतिहास में जो बेगम से अनुमति लेने की बात कही गई है क्या वो गलत है ? फिर
एक बार खोज करने पर पता चला कि 1742 से 1777 तक शासक तो नवाब फैज़ मोहम्मद खान
ही थे लेकिन वो कुछ ज्यादा ही धार्मिक और वैरागी थे इसलिये उस समय में प्रभावी
शासक उनकी सौतेली माँ ममोला बाई थी । इस तथ्य के बाद सारे आँकड़े मेल खा जाते हैं
।
- लूट के पैसों के बारे में
बताया जाता है कि कई बार कुछ लुटेरों को नरसिंहगढ़ रियासत द्वारा संरक्षण दिया
जाता था तथा उनसे इसके एवज में कुछ धन ले लिया जाता था ।
- श्री रघुनाथ जी मंदिर के
वर्तमान पुजारी पं. श्री विनोद कुमार जी मेहता ने स्वयं मंदिर की स्थापना एवं
वर्तमान व्यवस्था के संबंध में जानकारी दी । इस अमूल्य जानकारी के लिये मैं श्री
मेहता जी का आभारी हूँ ।
- मंदिर के संबंध में कई अन्य
तथ्य बड़े भैया वरिष्ठ पत्रकार श्री रूपेश सिंह जी से जानने को मिले । मैं भैया
रूपेश सिंह जी का भी आभार व्यक्त करता हूँ ।
- इसके अलावा विकीपीडिया एवं
अन्य वेबसाईट से भी कुछ जानकारी एकत्र की गई है । जो लेख को तथ्यपरक बनाने में
काफी कारगर सिद्ध हुई ।
गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015
उपेक्षित राम...
सोमवार, 15 जून 2015
बुद्ध !
बुद्ध तुम महान हो गए
सजावट का सामान हो गए
कभी दीवार पर टंगे गहन ध्यान में,
कभी शो केस पर लेटे बड़े आराम में,
किसी के गले में पड़े हुए
फैशन की पहचान हो गए,
अरे बुद्ध तुम तो, बड़े महान हो गए ।
मांस और मदिरा सब,
तुम्हारे सामने चलता है,
दूसरों का
टकटकी लगाकर देखना खलता है।
प्रेमी की बाहों में पड़ी बालाएं भी,
तुमसे खौफ नहीं खाती,
तुम्हारी मुंदी हुई आँखे ही,
सबको रास आती ।
बिस्तर में लौटती सुबह,
तो कभी रंगीन शाम हो गए,
हे बुद्ध ! तुम तो वाकई बहुत महान हो गए ।
मंगलवार, 26 मई 2015
ग्रीष्म
तुम नाराज़ हो बहुत
अब के बरस
मैं समझता हूँ
इस नाराज़गी का कारण भी
बरसती बूंदों ने जो अतिक्रमण किया है
तुम पर,
मगर अब हर बून्द
तुम सुखा चुकी
तुम्हारा बदला पूरा हुआ
अब नवीन सृजन के लिए
तुम्हारा शांत होना ही
प्रकृति का नियम है
और निर्दोष जीवों की प्रार्थना भी
यदि सम्भव हो सके
तो अपने क्रोध को ज़रा कम करना
ज़रा संयम करना ।


