शुक्रवार, 5 जून 2020

पर्यावरण दिवस


आज पर्यावरण दिवस है । सभी दिशाओं से शुभकामनाओं का आवागमन हो रहा है । मगर शुभकामनाएं मनुष्य से मनुष्य तक ही हैं, पर्यावरण तक नहीं, क्योंकि कहीं से खबर है कि, खनन के लिए वन की ज़मीन आवंटित की गई है और कहीं से खबर है, किसी ने एक गर्भिणी हथिनी को निर्ममता से मार दिया है और आज तो ताज़ा तरीन खबर ये भी आई है कि, लुप्तप्राय डॉल्फिन जो लॉकडाउन के प्रभाव से गंगा में फिर से दिखने लगीं थीं, उनमें से एक को ज़िंदा जला दिया गया है । ये खबरें जश्न या बधाई के भाव तो पैदा नहीं कर सकती । मनुष्य अपने स्वार्थ को साधने के लिए किसी भी स्तर तक जा सकता है, यह समय समय पर साबित हो चुका है । कभी मनोरंजन के लिए, तो कभी अपने भोग और विलास के लिए । हमने अब तक दोमुँहा सांप सुना देखा है, वास्तव में उसके दो मुँह नहीं होते, मगर ऐसा लगता है कि, मुँह दोनों ओर हैं । मनुष्य के साथ भी ऐसा कुछ मामला है, इसके तो दिखते भी नहीं और लगते भी नहीं मगर होते जरूर हैं । हम वातानुकूलित कक्ष में बैठकर पर्यावरण बचाने की योजनाएं तैयार करते हैं । पेट्रोल की कीमत पर रोज़ रोते चीखते हैं मगर ज्यादा माइलेज वाले वाहन इस्तेमाल नहीं करते, ज्यादा झाँकीबाजी वाले इस्तेमाल करते हैं । पेड़ काटे जाने पर सोश्यल मीडिया पर बड़ा ही दर्द ज़ाहिर करते हैं, मगर होटल में पेपर नेपकिन/टिश्यू पेपर ही इस्तेमाल करते हैं ।  वन्यजीव संरक्षण के नाम पर हमने बड़े बड़े राष्ट्रीय उद्यान घोषित किये हैं, मगर उनका मुख्य उद्देश्य अंधाधुंध पर्यटन से पैसा कमाना है । अब आप कहेंगे कि ये तो सरकार ने किया है, सरकार को ऐसा नहीं करना चाहिए, मगर आप फिर गलत हैं, आप माँग और पूर्ति के सिद्धांत को भूल रहे हैं । जब आप बेवजह बिजली जलाते हैं तो यह माँग पैदा करती है और अधिक उत्पादन की, जब आप किसी भी कारखाने में बनी कोई वस्तु बेवजह खरीदते हैं, तो यह माँग पैदा करती है उत्पादन की, और ऐसे कई उदाहरण हैं और सभी के मूल में एक ही बात है माँग बढ़ेगी तो उत्पादन होगा, उत्पादन होगा तो प्रकृति का दोहन भी होगा और दोहन के लिए विनाश भी होगा ये अकाट्य सत्य है और यही वास्तविक तथ्य है । एक भ्रम और भी दूर कर लें कि आप पर्यावरण या प्रकृति को बचा सकते हैं, आपको सिर्फ अपनी ही जाति की चिंता करनी चाहिए और सिर्फ इसीलिए पर्यावरण को संरक्षित करना चाहिए, क्योंकि हम इस पर्यावरण के एक छोटे से अंग मात्र हैं, हमारे होने के पहले भी यह समस्त रूप से व्याप्त था और हमारे बाद भी होगा, मगर अगर हम न सम्भले तो हम समाप्त हो जाएंगे । इसलिए इसे गंभीरता से समझें और जितना सरल हो सके उतना सरल जीवन जियें मेरा दावा है, आप ज्यादा बेहतर महसूस करेंगे ।
अंत में मेरी पर से आप सभी को पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं 🙏🏻
- विश्वास
इंटरनेट से साभार-


मंगलवार, 12 मई 2020

महँगे लोग

वो जो बड़ी सड़क पर,
कुछ हौंसले चले जा रहे हैं,
कुछ अखबारों, समाचारों ने कहा,
कई जिंदा हैं, कुछ मरे जा रहे हैं ।

कई कहानियाँ,
शहर दर शहर,
नंगे पाँव चल पड़ी हैं ।
पैरों के नीचे,
कुछ फ़टे पुराने सपनों के,
किस्से बिछाए जा रहे हैं ।

कुछ बचपन रोटी की आस में,
मीलों तक उछलते रहे,
अब खेल ये है कि,
एक दूजे के,
छाले सहलाये जा रहे हैं ।

सुना है साहब को,
उस ओर से गुजरना है ,
गाड़ी में,
नए पर्दे लगाए जा रहे हैं ।

कुछ सिसकियाँ हैं,
जो हवाओं में,
बह रहीं हैं सब तरफ,
साहब जिंदाबाद के,
नारे लगाए जा रहे हैं ।

गरीबी के बहुत सवाल,
शोर से करने लगे थे,
सुना है, विदेशों से,
महँगे लोग मँगाये जा रहे हैं ।

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

बदलते रहे


सालों साल हर साल बदलते रहे
कभी हाल तो कभी मकाम बदलते रहे
नहीं बदले तो सिर्फ हम ही न बदले
बाकी सब सरेआम बदलते रहे ।

कुछ ख्वाहिशों की कीमत इतनी चुकानी पड़ी
पूरे साल भर ही हम, नए नए मकाँ बदलते रहे ।

तुम्हें तो मालूम थी मेरी इफ़्फ़त ए नीयत
मग़र फिर भी, तुम इल्ज़ाम बदलते रहे ।

मेरी इल्तिज़ा थी कि मोहब्बत न बँटें कभी
और वो माशूको के नाम बदलते रहे ।

दोस्तों की महफ़िल का ये मंजर अजीब था
भीतर के शक बाहर के ज़ाम बदलते रहे ।

बातों ही बातों में उनका ज़िक्र न आ जाए कहीं
मिरे शातिर अल्फ़ाज़, बातों का सामान बदलते रहे ।


गुरुवार, 20 जून 2019

रिश्ते

रिश्ते प्लास्टिक के तिरपाल की तरह होते हैं जो आपकी मूसलाधार बारिश से सुरक्षा करते हैं लेकिन वक्त की धूप के साथ पलते जाते हैं और फैल जाते है एक नज़र देखने में लगता है कि ये बृहद हो रहे हैं जबकि इनका आपसी तालमेल कमजोर होता जाता है और फिर अपने अपने अहंकार के मौसम की मार पड़ते पड़ते अंततः फट जाते हैं । और फिर कभी पहले की तरह नहीं हो पाते...

रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे पे फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ी जाय ।

मंगलवार, 23 अक्टूबर 2018

जन्मपत्रिका में शनि विचार

ज्योतिषीय नवग्रहों में सबसे ज्यादा भयभीत करने वाले ग्रह के रूप में अपनी पहचान बनाये हुये ग्रह हैं शनि । जो कि वैदिक कथाओं में देव पद पर आसीन हैं फिर भी राहु केतु का दैत्य होते हुये भी उतना भय नहीं है जितना शनि देव का है । भय भी ऐसा कि शनिवार के दिन कोई कमण्डल में शनि का दान लेने द्वार पर आ जाये तो उसे नकारने का साहस नहीं जुटा पाते और शनिवार के दिन जूते चप्पल चोरी हो जाने पर भी मुस्कुराते हुये एक तसल्ली के साथ नंगे पैर घर आ जाते हैं कि चलो शनि का दान उतर गया । पर क्या वाकई शनिदेव इतने बुरे हैं कि हर किसी को सिर्फ परेशान ही करते रहें ? नहीं ! वास्तव में ऐसा नहीं है, लेकिन विगत कुछ दशकों में जैसे जैसे पारिवारिक, सामाजिक, और व्यावसायिक परेशानियों के कारण मानसिक संताप ‌और तनाव बढता गया है वैसे वैसे ही अंधविश्वास और धर्म के नाम पर कालाबाजारी भी बढी है । ऐसे में कुछ कर्मकाण्डी पंडितों  ने जिन्हें ज्योतिष का ज्ञान नहीं है या अधूरा ज्ञान है, कुछ ज्योतिषीय योग एवं स्थितियों के माध्यम से अपने यजमानों को डराकर खूब चाँदी काटी है । उनके अनुसार आपके जीवन में किसी भी तरह का कोई भी दुख संकट हो तो उसका कारण या तो कालसर्प योग होगा, अगर न हुआ तो शनि की ढैया या साढे़साती मिल ही जायेगी क्योंकि एक समय में २ राशियों पर ढैया और ३ राशियों पर साढे़साती चल ही रही होती है । मतलब कि कुल १२ राशियों में से ५ पर तो शनि का प्रभाव होगा ही और अगर ये भी न हो तो शनि की युति, दृष्टि, स्थिति, दशा कुछ तो मिलना ही है बस इतने में काम हो गया ।

          सबसे अव्वल तो ये कि कोई भी ग्रह बुरा या अच्छा नहीं होता । बस सभी का अपना स्वतंत्र व्यक्तित्व है और उसी के अनुसार उसके कारकत्व होते हैं, और किसी पत्रिका में कोई ग्रह किन भावों का प्रतिनिधित्व कर रहा है उसी के अनुसार फल दे सकता है । जब हम शनि की बात करते हैं तो शनिदेव को हमें अपने कर्मों का फल देने का अधिकार दिया गया है ध्यान दीजिये अच्छे कर्मों का फल अच्छा ही होगा और बुरे कर्मों का फल बुरा होगा । और दूसरी महत्वपूर्ण बात कि कोई भी ग्रह फल तभी दे सकते हैं जब दशा और गोचर में वे प्रभावी हों और किसी भाव से संबंधित फल देने के लिये दशा और गोचर अनुकूल स्थिति में हों  । यहाँ भी साढ़ेसाती और ढैया का प्रभाव स्पष्ट हो जाता है क्योंकि ये योग या कहें कि यह स्थिति सिर्फ गोचर के अनुसार होती है जबकि किसी भी प्रकार का फल कथन करने के लिये दशा का अध्ययन करना भी अत्यंत आवश्यक है । 
          शनि, सूर्यपुत्र हैं लेकिन दोनों पिता पुत्र में मतभेद है, दोनों के कारकत्व भी विरोधी हैं या कहें कि बिल्कुल विपरीत हैं । एक समानता ये है कि दोनों को ही क्रूर कहा गया है, लेकिन दोनों को जो कार्य विधान द्वारा सौंपा गया है उसके लिये क्रूर होना भी आवश्यक है । सूर्य राजा हैं और उन्हें निष्पक्ष निर्णय देने के लिये क्रूर होना आवश्यक है और शनि कर्म फल दाता हैं इसलिये शनि को भी क्रूर होना पड़ता है यदि वे क्रूर न होकर भावुक हो जायें तब वे निष्पक्ष रूप से कर्म फल नहीं दे पायेंगे । सूर्य जहाँ राजा का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं शनि प्रजा का प्रतिनिधित्व करते हैं, अगर सूर्य प्रथम श्रेणी के अधिकारी हैं तो शनि चतुर्थ श्रेणी के कर्मचारी । सूर्य शासक को इंगित करते हैं तो शनि कर्मठ कार्यकर्ता, आज्ञाकारी सेवक को इंगित करते हैं । सूर्य सबसे मंहगी और दुर्लभ धातु स्वर्ण का प्रतिनिधित्व करते हैं तो शनि को सर्व सुलभ लोहा प्रिय है । शनि समुद्री नमक का प्रतिनिधित्व करते हैं तो नमक के अधिक सेवन को सूर्य के पीड़ित होने का कारक बताया गया है । सूर्य भौतिक उन्नति नाम, पद, प्रतिष्ठा के सूचक हैं तो शनि आध्यात्मिक उन्नति के । इस तरह हम समझ सकते हैं कि पिता पुत्र में मतभेद क्यों है ।
          शनि अध्यात्म के भी प्रबल कारक हैं, ‌और इसी वजह से कुछ और इल्जाम भी शनि पर लगाये जाते हैं, जैसे कि शनि का स्वभाव एकाकी है, वे स्वार्थी हैं आदि । जबकि आध्यात्मिक विकास के लिये एकांत प्राथमिक आवश्यक तत्व हो जाता है, दूसरा आवश्यक तत्व है स्व के विकास की प्रवृत्ति । जिसके कारण शनि को स्वार्थी भी कहा गया है,  जब तक जातक स्वार्थी नहीं होगा तब तक वह अन्य में उलझा रहेगा और ऐसी स्थिति आध्यात्मिक विकास में बाधा साबित होगी और अन्यों से दूर करने के गुण के कारण शनि को विच्छेदकारी ग्रह भी कहा गया है । इसके बाद जरूरी है गहन चिंतन । शनि गहन चिंतन की प्रवृत्ति देते हैं और अनुसंधान जैसे कार्यों के लिये गहन चिंतन बेहद जरूरी होता है इसलिये शनि का प्रभाव जातक को अनुसंधान के क्षेत्र में भी ले जाता है, या शनि का प्रभाव होने पर जातक गहन चिंतन वाला, अनुसंधान और विश्लेषण कर्ता होता है । वह किसी बात को बहुत जल्दी भूलता नहीं है वरन मन में बार बार उसकी आवृत्ति करता रहता है और नये नये निष्कर्ष निकालता रहता है । विषय का आवश्यकता से अधिक चिंतन कभी कभी निराशावादी भी बना देता है, और नकारात्मक विचारों को जन्म देता है । कोई शुभ प्रभाव न होने एवं अन्य अशुभ प्रभावों के होने पर ऐसे जातक आत्महत्या को भी प्रेरित हो जाते हैं ।
           शनि को वृद्ध भी कहा गया है, वास्तव में वृद्ध होने का मतलब सिर्फ शरीर से वृद्ध होना नहीं होता बल्कि अपनी उम्र से अधिक उम्र वाली सोच रखने वाले को भी वृद्ध कहा जाता है । इसलिये शनि परिपक्वता के भी सूचक हैं । जब शनि के प्रभाव से जातक की सोचने की प्रवृत्ति गहन स्तर तक होगी तब ऐसा जातक जल्दी ही परिपक्व मानसिकता को पा लेता है और अपने हमउम्रों के बीच वृद्ध होने की उपाधि को पाता है । खासकर जब शनि पंचम भाव में स्थित हो तो जातक की सोच अपनी उम्र से काफी आगे चलती है । ऐसे जातक मध्यस्थता करने और परामर्श कार्य करने में भी सक्षम होते हैं ।
          शनि अनुशासन प्रिय हैं और सात्विक भी, जब भी शनि की दशा, अन्तर्दशा जारी हो या साढे़ साती या ढैया चल रही हो तब जातक को खान पान और व्यवहार में सात्विक रहने की हिदायत सबसे पहले दी जाती है । माँस मदिरा के सेवन से दूर रहना और वरिष्टों के साथ ही साथ अपने अधीनस्थ कर्मचारियों से भी उचित व्यवहार करना शनि की नज़रों में अपनी छवि सुधारने जैसा ही है । शनि बहुत ही व्यावहारिक दृष्टि से जीवन को देखते हैं और भावनाओं में बहकर निर्णय लेना शनि का सूचक नहीं है । भावुकता से शनि का संबंध कालपुरूष की कुण्डली से भी समझा जा सकता है, शनि का २ राशियों पर स्वामित्व है पहली राशि मकर जो कि कालपुरुष की कुण्डली में दशम भाव में स्थित हुई है यह राशि भावुकता के भाव अर्थात पंचम से षष्ठम् भाव में स्थित हुई है और दूसरी राशि है कुंभ जो कि पंचम से सप्तम में स्थित हुई है यानि कि पंचम से ठीक विपरीत भाव में । इस तरह दोनों ही राशियाँ भावुकता के पक्ष में नहीं हैं । इसीलिये शनि का प्रभाव होने पर जातक भावुक न होकर तर्कसंगत होता है । ऐसे जातक सिर्फ उन्हीं परंपरा का पालन कर पाते हैं जिनका तार्किक कारण उन्हें पता हो और न पता होने की स्थिति में वे तर्कसंगत व्यावहारिक कारण कि खोज भी करते हैं । तर्कसंगत होने के कारण ही शनि प्रधान जातक गणित, विज्ञान जैसे विषय की ओर अधिक आकृष्ट होते हैं और इंजीनियरिंग, तथा विधिक या न्यायिक विभाग जैसे व्यावहारिक और तार्किक क्षेत्रों को अपना कर्मक्षेत्र चुनते हैं । शनि दशम एवं एकादश भाव के स्वामी होकर कर्म को प्रधानता देते हैं, लाभ के कारक भी होते हैं  और साथ ही मितव्ययिता कि प्रवृत्ति भी देते हैं ।
          मन्दचार यानि मन्द गति से चलने वाला । शनि को मन्दचार कहा जाता है क्योंकि भचक्र की परिक्रमा पूरी करने में शनि को अन्य आठ ग्रहों की तुलना में सबसे अधिक समय लगता है, हालांकि खगोलीय दृष्टि से ये तुलना एक बेमानी ही है क्योंकि शनि का पथ भी अन्य ग्रहों की तुलना में सबसे बड़ा है और इसीलिये शनि एक राशि में अन्य ग्रहों की तुलना में अधिक समय तक रहते हैं । जब शनि को किसी भी राशि में एक लंबे समय तक रहना ही है तो उससे संबंधित फल देने में जल्दबाज़ी क्यों हो अतः शनि जिस भाव से संबंध बनाता है उससे संबंधित फल देने में समय अधिक लेता है । ये स्पष्ट हो कि शनि सिर्फ समय अधिक लेता है न कि फल देता ही नहीं है । और किसी भाव के फल विलंब से मिलना कभी शुभ होता है और कभी परेशानी का सबब बनता है, जैसे यदि शनि विवाह भाव में स्थित हो जाये या विवाह भाव के स्वामी से या भाव से किसी तरह संबंध बनाये तो विवाह में विलंब होना ही है जो परेशानी का कारण हो सकता है लेकिन, जब शनि अष्टम मृत्यु भाव से संबंध बना ले तो मृत्यु विलंब से देता है जो लंबी आयु का कारण बनता है । शनि की गति मंद होने के कारण ही शनि सुस्ती, आलस्य और कभी कभी लापरवाही का कारण भी बनता है ।
          शनि चूँकि सुस्त और धीमा ग्रह है और मंगल सेनापति होने के नाते चुस्त और फुर्तीला ग्रह है, इसलिये शनि और मंगल की ऊर्जा एकदम विपरीत हैं और जब दो विपरीत ऊर्जायें आपस में टकराती हैं तो विनाश की संभावना बढ़ जाती है शायद इसीलिये शनि मंगल की युति होने पर बनने वाले योग को विष योग कहा गया है । शनि को नपुंसक ग्रह भी कहा गया है जबकि निर्बीज राशियों में शनि कि एक भी राशि शामिल नहीं है फिर ऐसा क्यों ? मेरे मतानुसार शनि प्रजा के सूचक है और प्रजा कोई भी हो सकती है वो पुरूष हो सकती है और महिला भी और सभी लिंगों का मिश्रण भी । शनि निष्पक्ष हैं वे लैंगिक आधार पर कर्मों के फल प्रदान नहीं करते हैं । जहाँ अन्य ग्रह किसी न किसी लिंग का प्रतिनिधित्व करते हैं वहीं शनि किसी एक लिंग के सूचक नहीं हैं और शायद इसीलिये शनि को नपुंसक की संज्ञा भी दी गई होगी ।
          शनि के संबंध में अभी और भी बहुत कुछ लिखा जा सकता है, बारह भावों में शनि के प्रभाव और फल तत्पश्चात् अन्य ग्रहों से, विभिन्न राशियों एवं भावों में युति एवं दृष्टि आदि के फल लेकिन इस तरह से जितना भी लिखा जायेगा वो अपर्याप्त ही होगा क्योंकि सभी के अनुभव सर्वथा भिन्न हो सकते हैं । फिर भी मैनें अपने अनुभव एवं विश्लेषण के आधार पर शनिदेव के संबंध में अपनी अल्पबुद्धि से जो जाना है वह सुधि पाठकगण के लिये लिपिबद्ध किया है । संभावित त्रुटियों के लिये क्षमाप्रार्थी हूँ ।

-जयपुर से प्रकाशित पत्रिका -"ज्योतिष सिद्धांत" के अक्टूबर‍ - दिसम्बर 2018 के अंक में प्रकाशित

शनिवार, 9 सितंबर 2017

दास्तान ए देवालय 1 मंदिर श्री रघुनाथ जी नरसिंहगढ़

              पुराने किले के ठीक नीचे स्थित श्री रघुनाथ जी मंदिर की अपनी अलग ही दिलचस्प कहानी है । नरसिंहगढ़ रियासत की स्थापना के बाद दूसरा महत्वपूर्ण मंदिर था श्री रघुनाथ जी मंदिर । जिसका निर्माण नरसिंहगढ़ रियासत के तृतीय शासक महाराज मोती सिंह जी¹ द्वारा सन् 1761 में कराया गया । महाराज मोती सिंह जी का श्री राम के प्रति अटूट विश्वास था । शायद महाराज साहब की इसी अटूट श्रद्धा से प्रसन्न होकर एक रात को श्री रघुनाथ जी ने महाराज मोती सिंह जी को स्वप्न में स्वयं को इस्लामनगर की बावड़ी से निकालने की प्रेरणा दी । उस समय इस्लामनगर भोपाल रियासत की राजधानी हुआ करता था और भोपाल रियासत पर राज था मुसलमान नवाबों का । कहा जाता है कि उस वक्त मुस्लिम शासक होने की वजह से भोपाल रियासत में हिन्दू मंदिरों के शिखर न बनाये जाने का आदेश था । हिन्दू देव प्रतिमायें अस्थायी खपरैल की छत या तंबू में रखी होती थी । सुबह महाराज मोती सिंह जी ने अपना स्वप्न दरबार में अपने विश्वसनीय सभासदों को सुनाया और इस्लामनगर की बावड़ी से प्रतिमाओं को निकलवाने के लिये भोपाल रियासत की तत्कालीन शासक बेगम² से अनुमति लेने हेतु पत्र भेजा । बेगम को इस तरह के स्वप्न के सच होने पर संशय था किन्तु उन्होनें इसकी सहज अनुमति महाराज मोती सिंह जी को दे दी और साथ ही यह भी कहा कि यदि आपका ये स्वप्न सच साबित हुआ और बावड़ी से ऐसी कोई प्रतिमा निकलती है तो जो भी मोती सिंह जी चाहेंगे वे उन्हें देने को तैयार होंगी । महाराज मोती सिंह जी इसके लिये तैयार हो गये और प्रतिमाओं को निकलवाने के लिये कार्य शुरू किया गया और एक एक कर बावड़ी से पाँच सफेद संगमरमर की प्रतिमायें निकाली गई जिसमे अन्त में निकली भगवान श्री रघुनाथ जी की सबसे बड़ी प्रतिमा भी शामिल थी । पाँच प्रतिमाओं में माता जानकी, श्री रघुनाथ जी, लक्ष्मण जी, भरत जी तथा शत्रुघ्न जी की प्रतिमायें थी । स्वप्न के सत्य प्रमाणित होने पर महाराज मोती सिंह जी ने कोई जागीर या धन माँगने के बजाय बेगम से भोपाल रियासत के सभी हिन्दू मंदिरों पर शिखर न बनाये जाने के आदेश को रद्द कर मंदिरों के शिखर बनवाने की माँग रखी जिसे बेगम ने सहर्ष स्वीकार कर लिया और तभी से भोपाल रियासत के हिन्दू मंदिरों में शिखर बनाये जाने लगे ।

               चूँकि प्रतिमायें तो प्राप्त की जा चुकी थी मगर उन्हें विधि विधान से रखे जाने हेतु मंदिर का निर्माण अब तक नहीं किया गया था । इसलिये भोपाल से लौटते समय महाराज मोती सिंह जी ने नरसिंहगढ़ के नजदीक ही बसे एक छोटे से गाँव में अस्थायी रूप से प्रतिमायें रखवा दी । जिस गाँव में वे प्रतिमायें अस्थायी तौर पर रखी गयी थी उस गाँव का नाम बाद में रघुनाथपुरा हुआ । नरसिंहगढ़ लौटने के साथ ही महाराज ने रघुनाथ जी की स्थायी स्थापना के लिये मंदिर बनाये जाने का कार्य प्रारंभ कराया । इसके लिये किले के ठीक नीचे ही स्थान का चयन किया गया । मंदिर निर्माण का कार्य जारी था और लगभग पूर्ण होने को ही था तभी महाराज मोती सिंह जी को फिर से एक स्वप्न आया जिसमें रघुनाथ जी ने लूट के पैसे³ से मंदिर बनाये जाने पर नाराज़गी ज़ाहिर की, और फिर उस निर्माणाधीन मंदिर को वैसा ही छोड़ दिया गया तथा उसके करीब ही मंदिर निर्माण का कार्य दोबारा से प्रारंभ किया गया लेकिन इस बार मंदिर को बहुत ही सादा स्वरूप दिया गया जिसमें भगवान श्री रघुनाथ जी सहित पाँचों प्रतिमाओं की पूर्ण विधि विधान से स्थापना की गई।
              महाराज मोती सिंह जी की अटूट आस्था के चलते ही भगवान रघुनाथ जी को नरसिंहगढ़ रियासत के राजा के रूप में पूजा जाने लगा और महाराज स्वयं को दीवान या सेवक की तरह मानकर राजकाज का संचालन करते रहे । सभी दस्तावेजों पर भी हस्ताक्षर के स्थान पर राम नाम सही लिखा जाता तथा शाही मुद्रा लगा दी जाती थी महाराज स्वयं अपने हस्ताक्षर नहीं किया करते थे । कई सारे शासकीय कार्य और महत्वपूर्ण निर्णय श्री रघुनाथ जी के दरबार में बैठकर ही लिये जाते थे ।



ताज़ा हालात
                सन् 1889 में मन्दिर की सेवा पूजा का कार्य पं. श्री नाथूराम जी मेहता को सौंपा गया, इसके बाद कन्हैयालाल जी मेहता, श्री नित्यानंद जी मेहता, श्री विध्यानंद जी मेहता ने पींढी दर पीढी इस कार्य का निर्वहन पूरी आस्था के साथ किया । वर्तमान में पं. विनोद कुमार जी मेहता अपने भाईयों और पुत्रों के साथ मंदिर की सेवा पूजा का कार्य कर रहे हैं तथा मंदिर में रामनवमीं, जन्माष्टमी, हिंडोला उत्सव, विजयादशमी, अन्नकूट इत्यादि सभी मुख्य त्यौहार मनाये जाते हैं । राजा के शासन के समय में विजयादशमी के दिन मंदिर से विमान रवाना होने के पूर्व 21 तोपों की सलामी दी जाती थी, उसके बाद ही रावण दहन के लिये विमान रवाना होता था । वर्तमान में शासन एवं हिन्दू उत्सव समीति द्वारा विजयदशमी का त्यौहार मनाया जाता है तथा पुलिस प्रशासन द्वारा बन्दूकों की सलामी भी दी जाती है । प्रतिवर्ष दीपावली के दूसरे दिन अन्नकूट का आयोजन भी किया जाता है ।
    हमारे प्रदेश में बाकायदा धर्मस्व विभाग बना हुआ है और मंदिरों के जीर्णोद्धार एवं अन्य संबंधित कार्यों के लिये विभाग के पास बजट भी होता है, लेकिन वास्तविकता यह है कि रियासतों के विलय के बाद से कुछ कमाई वाले प्रसिद्ध मंदिरों को छोड़ दें तो बाकि की हालत बड़ी खराब हो रही है । ऐसा ही कुछ हाल हमारे रघुनाथ जी के मन्दिर का भी है । विलय के पूर्व तत्कालीन समय में राज कोष से 75/- रुपये महीने रघुनाथ जी के मंदिर को मंदिर से संबंधित खर्चों के लिये दिये जाते थे, जिसमें उस समय मन्दिर में बिजली‍ पानी, अनाज आदि की व्यवस्था आसानी से हो जाती थी और पुजारी भी अपने परिवार का पालन आसानी से कर लिया करते थे लेकिन आपको जानकर आश्चर्य होगा कि आज भी सरकार की ओर से मंदिर के खर्च के लिये 75/- रुपये महीना मंदिर प्रबंधक को दिये जाते हैं । शायद धर्मस्व विभाग आज भी 70 साल पहले की मंहगाई दर को ही मानते आ रहा है । इसके अलावा 1000/- रुपये महीना पुजारी को तनख्वाह के तौर पर दिये जाते हैं । वर्तमान में मन्दिर की ईमारत जगह जगह से क्षतिग्रस्त हो रही है । कुछ एक बार शासन की ओर से जीर्णोद्धार का कार्य कराया भी गया लेकिन वह पर्याप्त नहीं था ।
आज मंदिर की दिवारें अपनी दरारों के ज़रिये अपनी ऐतिहासिकता और उपेक्षा खुद बयाँ कर रही हैं।



  1. मंदिर की स्थापना का समय सन् 1761 में मोती सिंह जी महाराज द्वारा बताया जाता है जबकि जब मैनें नरसिंहगढ़ के इतिहास को थोड़ा खंगाला तब पता चला कि मोती सिंह जी महाराज की मृत्यु सन् 1751 में हो गई थी यानि रघुनाथ जी मंदिर की स्थापना के 10 वर्ष पूर्व, और 1761 में नरसिंहगढ़ के राजा महाराज खुमान सिंह जी थे । जिन्होनें 1751 से 1766 तक राजकार्य संभाला । निष्कर्षतः कहा जा सकता है कि मंदिर के निर्माण का कार्य मोती सिंह जी महाराज के समय में शुरु हो चुका हो लेकिन कार्य पूर्ण होने के पहले ही उनकी मृत्यु हो गई हो तथा बाद में उनके पुत्र महाराज खुमान सिंह जी के कार्यकाल में मंदिर स्थापित तो हुआ लेकिन मोतीसिंह जी महाराज का ही नाम शिलालेख पर लिखवाया गया । 
  2. दूसरी एक बात जो मंदिर के संबंध में कही गई है वो ये कि महाराज मोती सिंह ने अपने स्वप्न के आधार पर बावड़ी से प्रतिमाऐं निकालने के लिये भोपाल रियासत की तत्कालीन महिला शासक से अनुमति ली थी । जब मैनें इस बारे में कुछ खोज की तब पता चला कि भोपाल रियासत में सन् 1819 से 1926 तक 4 बेगमों ने शासन किया था लेकिन फिर भी ये वक्त प्रतिमाओं के निकलने के वक्त से मेल नहीं खाता । 1761 में मंदिर की स्थापना हुई और अगर मोती सिंह जी महाराज ने ही प्रतिमाओं के संबंध में स्वप्न देखा था तो उनकी मृत्यु यानि 1751 के पहले का ही कोई समय हो सकता है । भोपाल में सन् 1742 से 1777 तक नवाब फैज़ मोहम्मद खान ने शासन किया और उन्होंने ही भोपाल रियासत की राजधानी इस्लामनगर से भोपाल स्थानांतरित करवाई थी । लेकिन यहाँ पर फिर से एक संशय उत्पन्न होता है कि इतिहास में जो बेगम से अनुमति लेने की बात कही गई है क्या वो गलत है ? फिर एक बार खोज करने पर पता चला कि 1742 से 1777 तक शासक तो नवाब फैज़ मोहम्मद खान ही थे लेकिन वो कुछ ज्यादा ही धार्मिक और वैरागी थे इसलिये उस समय में प्रभावी शासक उनकी सौतेली माँ ममोला बाई थी । इस तथ्य के बाद सारे आँकड़े मेल खा जाते हैं । 
  3. लूट के पैसों के बारे में बताया जाता है कि कई बार कुछ लुटेरों को नरसिंहगढ़ रियासत द्वारा संरक्षण दिया जाता था तथा उनसे इसके एवज में कुछ धन ले लिया जाता था ।


स्त्रोत

  • श्री रघुनाथ जी मंदिर के वर्तमान पुजारी पं. श्री विनोद कुमार जी मेहता ने स्वयं मंदिर की स्थापना एवं वर्तमान व्यवस्था के संबंध में जानकारी दी । इस अमूल्य जानकारी के लिये मैं श्री मेहता जी का आभारी हूँ ।

  • मंदिर के संबंध में कई अन्य तथ्य बड़े भैया वरिष्ठ पत्रकार श्री रूपेश सिंह जी से जानने को मिले । मैं भैया रूपेश सिंह जी का भी आभार व्यक्त करता हूँ ।

  • इसके अलावा विकीपीडिया एवं अन्य वेबसाईट से भी कुछ जानकारी एकत्र की गई है । जो लेख को तथ्यपरक बनाने में काफी कारगर सिद्ध हुई ।








गुरुवार, 22 अक्टूबर 2015

उपेक्षित राम...

                  कुछ दशकों पहले तक जब हम बहुत "विकसित और सभ्य" नहीं हुआ करते थे, तब दशहरा मैदान में मिट्टी का एक कुरूप पुतला बनाया जाता था, दस सिरों वाला और एक व्यक्ति को नीलवर्ण में श्रृंगारित कर मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम का बेहद मोहक रूप दिया जाता था और लोग उस छवि को देखने दशहरा मैदान जाया करते थे । प्रभु राम के दर्शन करने, पूजन करने, उनके चरणों के स्पर्श का अद्भुत आनंद पाने । वो अपने साथ अपने अंतर में उस विशिष्ट पुरुष का अति मोहक स्वरूप बड़े उल्लास से ले आते थे, इस विश्वास के साथ की राम हमारे बीच ही हैं हमेशा । जब जब मेरे भीतर का रावण सर उठाने लगेगा राम आएंगे... जरूर आयेंगे ।
                  मगर बीते वक्त में विकास बड़ी तेज़ी से हुआ है और पीढ़ी दर पीढ़ी होता ही जा रहा है । अब रावण की सुंदरता महत्वपूर्ण है, उसका विशाल आकार भी जरूरी है और आतिशबाज़ी की मोहकता तो दर्शकों का विशेष आकर्षण है ही..... अब दशहरा मैदान की खचाखच भीड़ रावण को देखने जाती है। अब रावण बहुत दाद बटोरता है और बच्चे अट्टहास करते हुए घर लौटते हैं... हा.हा..हा... मैं हूँ लंकेश । और फिर पूरे साल वो छवि याद रखी जाती है नए वर्ष के रावण से तुलना के लिए ।


लेकिन राम... राम का क्या ?...
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                  राम भी आज रावण के कद के आगे कहीं खो गए हैं...उपेक्षित हो गए हैं । ज्यों ज्यों रावण का कद बढ़ता जा रहा है राम अदृश्य होते जा रहे हैं ।
                  बड़ा आश्चर्य ये भी है की हम रावण को इतना खूबसूरत और आकर्षक दिखाकर भी समाज में राम के आदर्शों की उम्मीद कर रहे हैं जो किसी भी तरह संभव नहीं ।

फिर भी आप सभी को आज रावण के उस आकर्षक पुतला दहन की बहुत शुभकामनायें.....।


हो सके तो राम की सुंदरता पर भी एक नज़र डालियेगा जरूर... जय श्री राम ।