अव्यक्त…! वास्तव में अव्यक्त एक प्रदर्शनी है मेरे विचारों की, अक्सर मेरे भीतर कई विषयों को लेकर उठने वाले ज्वार भाटे को मैं महसूस करता हूँ, मगर ये मेरे भीतर ही जन्म लेता और खत्म हो जाता है कभी कभी कुछ बेहद संवेदनशील और आक्रोशित होता है तो कभी एक गंभीर और शांत दार्शनिक की तरह । इन्हीं कुछ परेशानियों के चलते इस "अव्यक्त" ज्वार भाटे को ब्लाग के रूप में आप सभी के समक्ष व्यक्त करने का मेरा प्रयास ही "अव्यक्त" है ।
वो
लफ्ज़ जो
कहीं अटक कर रह गया था तु्म्हारे
लबों पर, हाँ...
वही जो
कहीं, तुम्हारे
दाँतो से दबे होंठ के पीछे दबा
रह गया था, और
जब तुमने पलटकर देखा आँखों
की कोर से झाँक
रहा था, उन्हीं
बड़ी बड़ी नमकीन
हो चुकी आँखों से ।
मुझे इंतज़ार था उसका तब
भी और अब
भी है, उसी
बेताबी के साथ ।
क्या हुआ ग़र बालों
ने अपना रंग खो दिया, क्या
हुआ ग़र आँखे
शीशों की मोहताज हो गई, क्या
हुआ...।
तुम्हारी मुस्कान तो आज भी वही है बिल्कुल
निर्दोष और नई, जैसी
तब थी जब
हम तुम रेत
में घरौंदे बनाया करते थे, और
तब भी जब कॉलेज
जाया करते थे, फिर
तुम अचानक बिना
कुछ कहे बिना
कुछ सुने, मुझे
तन्हा रास्ते में मुन्तज़िर
छोड़ गई ।
मैं आज भी वहीं खड़ा हूँ, बस
उसी एक लफ्ज़ के इंतज़ार में.. तुम्हारे
प्यार में... हमारे
प्यार में..... -विश्वास शर्मा (05 Oct 2012 )
मैं करीब १५ साल का रहा होगा, जब मैंने १०वीं की परीक्षा दी थी, वो सन् २००१ था ।
गर्मी की छुट्टियाँ शुरू हो चुकी थी और यही मौसम था जब तोते पेंड़ की पोल में अण्डे
दिया करते हैं । मैंने भी जिद पकड़ ली कि मुझे भी एक तोता चाहिये बस । हालाँकि इसके
पहले मैं एक खरगोश, दो कछुए, और एक सफेद चूहा अपने पास रख चुका था मगर अब जिद थी तोते
की, घर में भी सब परेशान मगर क्या करें, बात कोई बहुत बड़ी भी नहीं थी सो थोड़ी ही मेहनत
के बाद तोता रखने की अनुमति मिल गयी । मैनें बड़े उत्साह से पिंजरे को तैयार करने का
काम शुरू किया, खुद अपने हाथ से ही पिंजरे की सफाई की और नये रंग में रंग दिया । मगर
अब समस्या थी कि तोता लाऐं कहाँ से ? कस्बाई शहर वहाँ ऐसी कोई दुकानें भी नहीं हुआ
करतीं बड़े शहरों की तरह जहाँ जानवरों की खरीद फरोख्त की जाती हो । बस कुछ लड़के जो जंगल
जाया करते थे और इस काम को करते आए थे उन्हीं से कह दिया कि कोई तोता लाकर दे दो ।
बहुत दिन बीत गये.. निराशा बड़ती गयी.. मौसम बीतता ही जा रहा था और इस बात की आशंका
थी कि अब तो बच्चे बड़े होकर उड़ भी गए होंगे । बहुत उदास सा मैं इस दर्द से निजात पाने
के लिए कुछ दिनों के लिए अपने एक रिश्तेदार के यहाँ चला गया । कुछ दिन बाद खबर मिली
कि किसी लड़के ने तार पर बैठे एक नौसिखिया तोते को गुलेल से गिरा लिया और मेरे छोटे
भाई ने ये देख कर २० रूपए में उससे वो तोता ले लिया है । अहा ! मेरी खुशी का ठिकाना
न रहा क्योंकि मैं तो लगभग उम्मीद छोड़ ही चुका था, खैर मैं जल्द से जल्द घर लौटने की
तैयारी में लग गया ।
रोज़
सुबह शाम उसके साथ बातें करना, और नये नये शब्द सिखाने की कोशिश करना.. हर शाम पिंजरे
को लेकर बरामदे में या छत पर चले जाना मेरी दिनचर्या का हिस्सा बन गया । शुरूआत में
कुछ वो भी सहमा सा था मगर धीरे धीरे घुल मिल गया । वो कई बार मेरे ही साथ थाली में
खाना खाता, जब पिंजरे से बाहर होता तो मैं उसे घर में ही बड़े हॉल में उड़ाया करता था
और वो बेझिझक मेरे ऊपर कंधे या सिर पर चढ़कर सो जाता, वो जाग न जाए इस डर से मैं बहुत
समय तक बिल्कुल एक ही स्थिति मैं बैठा रहता । मुझे लगता कि वो बहुत खुश है मगर मेरा
ये भ्रम समय के साथ जाता रहा जब मैंने उसे नोटिस करना शुरू किया । जब भी शाम को मैं
उसे बाहर बरामदे में या छत पर लेकर बैठता वो बहुत बोलता और बड़ा उत्साहित सा लगता मगर
वास्तव में वो शायद घर लौट रहे दूसरे परिंदो को देखकर व्याकुल सा हो जाता था । मुझे
बात समझ आ रही थी कि मैंने कितनी बड़ी गलती की है । जिसे ऊपर वाले ने उड़ने के लिए पंख
दिये हैं आज मेरी वजह से वो पंख होने के बावजूद उड़ नहीं सकता... सिर्फ दूसरों को उड़ते
देख सकता है । कई बार मेरे ज़ेहन में आया भी कि मैं उसे आजाद कर दूँ मगर ऐसा करने पर
वो मारा जाता... वो उड़ना भूल चुका था, उसके परों में अब वो मजबूती नहीं रही थी ।
२००३ में मैं अपनी पढ़ाई के लिए इन्दौर चला गया । और मुझे याद है २००६ में एक सुबह
वो अपने पिंजरे में गिरा हुआ मिला... वो मर चुका था... अब आज़ाद था । कुछ महीने बाद
जब मैं घर पहुँचा तब मुझे पता चला... मुझसे ये छुपाया गया था... मुझे दुःख के साथ कुछ
सुकून भी था कि अब वो किसी पिंजरे में नहीं है । मगर वो एक तोता अपनी सारी जिंदगी देकर
मुझे ये सिखा गया कि किसी भी परिंदे को कैद करना कितना गलत है, और ये सीख उस छोटी सी
जान की यादों के साथ हमेशा मेरे साथ रहेगी... मेरी कोशिश रहेगी कि मैं ज्यादा से ज्यादा
लोगों तक अपने इस अनुभव को पहुँचा सकूँ... ताकि कुछ परिंदो को कैद होने से रोक कर या
कैद से आजाद होने का कारण बनकर मैं अपनी आत्मा को कुछ सुकून दे सकूँ... पश्चाताप कर
सकूँ अपनी जिद का.......!
सड़क के किनारे भीड़ में तन्हा खड़ा "टेसू" । मायूस सा फूलों से लदा हुआ, बस इस इंतज़ार में कि कोई तो आये और माँग ले एक फूलों कि बौछार, कि कोई तो आये और माँग ले रंगों कि फुहार, कोई तो आये समेटने को फैले हुए ये फूल हजार, मगर नहीं... कोई नहीं आता... कोई भी नहीं आता करीब, सभी गुज़र जाते हैं ज़रा दूर से ही, और ये बूढ़ा पेड़ खो जाता है पुरानी यादों में जब फाल्गुन का महीना लगते ही आ जाते थे सभी... बच्चे और बूढ़े भी, और चुन लेते थे फूल कई सारे... और चेहरों पर बड़ी ही रंगीन सी मुस्कुराहट लिए लौट जाते थे अपने घरों को... फिर ये सिलसिला खत्म होता गया... और वक्त के साथ... टेसू गुमनाम हो गया... कभी निकलो उस सड़क से तो गौर करना... टेसू अब भी बूढ़ी आँखें उसी सड़क पर टिकाए खड़ा है, इंतज़ार कर रहा है...।