अव्यक्त…! वास्तव में अव्यक्त एक प्रदर्शनी है मेरे विचारों की, अक्सर मेरे भीतर कई विषयों को लेकर उठने वाले ज्वार भाटे को मैं महसूस करता हूँ, मगर ये मेरे भीतर ही जन्म लेता और खत्म हो जाता है कभी कभी कुछ बेहद संवेदनशील और आक्रोशित होता है तो कभी एक गंभीर और शांत दार्शनिक की तरह । इन्हीं कुछ परेशानियों के चलते इस "अव्यक्त" ज्वार भाटे को ब्लाग के रूप में आप सभी के समक्ष व्यक्त करने का मेरा प्रयास ही "अव्यक्त" है ।
मंगलवार, 17 अगस्त 2021
सावन का मेला
शनिवार, 17 जुलाई 2021
ज्योतिष की उपयोगिता
मंगलवार, 6 जुलाई 2021
आज की ताज़ा खबर
शुक्रवार, 5 जून 2020
पर्यावरण दिवस
अंत में मेरी पर से आप सभी को पर्यावरण दिवस की शुभकामनाएं 🙏🏻
मंगलवार, 12 मई 2020
महँगे लोग
कुछ हौंसले चले जा रहे हैं,
कुछ अखबारों, समाचारों ने कहा,
कई जिंदा हैं, कुछ मरे जा रहे हैं ।
कई कहानियाँ,
शहर दर शहर,
नंगे पाँव चल पड़ी हैं ।
पैरों के नीचे,
कुछ फ़टे पुराने सपनों के,
किस्से बिछाए जा रहे हैं ।
कुछ बचपन रोटी की आस में,
मीलों तक उछलते रहे,
अब खेल ये है कि,
एक दूजे के,
छाले सहलाये जा रहे हैं ।
सुना है साहब को,
उस ओर से गुजरना है ,
गाड़ी में,
नए पर्दे लगाए जा रहे हैं ।
कुछ सिसकियाँ हैं,
जो हवाओं में,
बह रहीं हैं सब तरफ,
साहब जिंदाबाद के,
नारे लगाए जा रहे हैं ।
गरीबी के बहुत सवाल,
शोर से करने लगे थे,
सुना है, विदेशों से,
महँगे लोग मँगाये जा रहे हैं ।
बुधवार, 25 दिसंबर 2019
बदलते रहे
गुरुवार, 20 जून 2019
रिश्ते
रिश्ते प्लास्टिक के तिरपाल की तरह होते हैं जो आपकी मूसलाधार बारिश से सुरक्षा करते हैं लेकिन वक्त की धूप के साथ पलते जाते हैं और फैल जाते है एक नज़र देखने में लगता है कि ये बृहद हो रहे हैं जबकि इनका आपसी तालमेल कमजोर होता जाता है और फिर अपने अपने अहंकार के मौसम की मार पड़ते पड़ते अंततः फट जाते हैं । और फिर कभी पहले की तरह नहीं हो पाते...
रहिमन धागा प्रेम का मत तोड़ो चटकाय,
टूटे पे फिर न जुड़े, जुड़े गांठ पड़ी जाय ।

